Thursday, January 30, 2014

गर तू आ जाता

डॉ जेन्नी शबनम
1.
पानी बहता जैसे
बिन जाने समझे
जीवन गुजरा वैसे !
2.
फूलों-सी खिल जाती
गर तू आ जाता
तुझमें मैं मिल जाती !
3.
अजब यह कहानी है
बैरी दुनिया से
पहचान पुरानी है ।
4.
सुख का सूरज चमका
आशाएँ जागी
मन का दर्पण दमका ।
-0-

डॉ सरस्वती माथुर
मन मेरा दीवाना
फुरसत मिलते ही
आकर तुम मिल जाना l
2
सपने तेरे आ
मेरे  नैनों में
केवल ही तुम छा l
3
 गरजे बरसे बादल
 नैनों में डाला    
 है प्रीत भरा काजल l













Monday, January 27, 2014

रिश्तों के कन्दील

1-डॉ भावना कुँअर
1
बुझ ही गए
जगमगाते  थे  जो
रिश्तों के कन्दील,
सोचते हो  क्यों?
फेंक दो वो बोझ जो
जीवन गया लील
-0-
2-अनिता ललित
1
बाहर मीठे
अन्दर ज़हरीले
कड़वाहट -भरे
ये स्वार्थी रिश्ते
पल-पल नोचते
तिल-तिल मारते!
2
देते हैं धक्का
प्रेम की ऊँचाई से
घृणा के समुद्र में
स्वार्थी रिश्ते
अपनों के भेस में
दुश्मन को मात दें !
3
शीतल छाया
फलों से लदी डाली
सबका आनन्द लें
मौका पाते ही
जड़ों को काट देते
ज़रा न झिझकते  ।
-0-

सम्बन्धों का तर्पण

1-डॉ सुधा गुप्ता
1
छली मुखौटे
तत्पर अभिनय
निज-हित- साधन
विवश किया
नाटक-समापन
सम्बन्धों का तर्पण ।
2
बोझ थे अन्धे
प्राणतत्त्व गायब
वैतालसे चिपके
ढोते थकी तो
जलांजलि दे , किया
सम्बन्धों का तर्पण !
-0-
2-भावना सक्सैना
1
घाव खरोंचे
रिश्तों के नाखूनों से
क्षत- विक्षत मन।
तोड़ें जंजीरें
बंधन न निभाएँ
सुख की साँसें पाएँ।
2
 रिश्ते सभी तो
उम्र के होते छोटे
चार दिन मुस्काते
हँसते -गाते
औपचारिकता में
घट रीत ही  जाते ।

-0-

अंदर दागदार

ताँका
डॉ अनीता कपूर
1
ये जो अपने
बनते हैं यूँ ख़ास
ओढ़े चादर
ऊपर से उजली
अंदर दागदार ।
2
चारों तरफ
उग आए है रिश्ते
गिरगिटों-से
संवेदनाओं-लदी
लताएँ मर रही ।
 -0-
सेदोका
डॉ अनीता कपूर
1
बंदूकें हो या
कागज़ और स्याही
ईमान भयाक्रांत
देखके स्वार्थी
इरादों की शक्ल में
गोली व कलम को
2
अपना कद
गर लम्बा करते
मेरे कन्धे के बिना
तय है यह-
आज भी हमारे वो
रिश्ते रेशमी होते
3
रिश्तों की घड़ी
आज भी दीवार पे
यूँ ही है सूनी खड़ी
स्वार्थी सुइयाँ
लम्हे समेट भागीं
घायल हुई घड़ी
4
मानवीयता
बनी है कब्रगाह
घनघोर चुप्पी की
चादर ओढ़े
रिश्तों ने बेशर्मी के
टाँकें लगा दिये हैं

-0-

Sunday, January 26, 2014

दे ऐसा मंत्र मुझे


1-माहिया
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
तेरा ना मेरा हो
अपने भारत में
खुशियों का डेरा हो।
2
मैं रोज़ दुआएँ दूँ-
खूब बहार खिले’-
दिन-रैन सदाएँ दूँ।
3
लिख गीत जवानों का
जिनके दम से  है
मौसम मुस्कानों का ।
4
दे ऐसा मंत्र मुझे
महका ,मर्यादित- सा
देना गणतंत्र मुझे ।
-0-
2-ताँका
डॉ सरस्वती माथुर
1
सत्य- अहिंसा
प्रेम सुधा बरसा
मातृभूमि में
लहराया है झंडा
अमन हमें प्यारा l
2
कोशिश करें -
प्यार की सुगंध से
मिलजुल के
देश को महकाए
द्भाही सिखाएँ l

-0-

Saturday, January 25, 2014

जाड़े की धूप

1-डॉ सरस्वती माथुर
1
सर्द हैं रातें
बर्फीली वादियों में
कँपकँपाते दिन
जाड़े की धूप
शीत लहरों पर
जैसे गरम बिछौनाl
-0-
रेनु चन्द्रा माथुर
1
 सर्द सुबह
कोहरे के रहते
आस रची है मैंने
साँझ  ढलते
सागर -सी गहरी
आह भरी है मैने ।

-0-

Thursday, January 16, 2014

कितने भोले हो !

1-शशि पाधा
1
यह कैसा बंधन है
आहट सुनते ही
बोले यह कंगन है ।
 2
तुम चुपचुप क्यों रहते
कितने भोले हो !
दो नयना सब कहते ।
 3
यह बिरवा भूल रहा
पाहुन आयो ना
बौराया झूल रहा ।
4
पूछो इन घड़ियों से
पल- छिन भूल गईं
गिनना इन लड़ियों से ।
5
मन कैसा सीधा है
तुम तो जानो ना
तुझ पर  ही रीझा है ।
6
यह कौन निशानी है ?
झीलें सूख गईं
नयनों में पानी है ।
-0-

रूठ गयी कलियाँ

शशि पुरवार
1
क्यों मौसम ज़र्द हुआ
रूठ गयी कलियाँ
भौरों को दर्द हुआ  ॥
2
क्यों सूख रही डाली
चुभन भरी पाती
बाँच रहा है माली ।
3
तुमको कब था  रोका
सपनो में मिलना
अँखियों को , दो मौका
4
मैंने पी है हाला
कवियों का जीवन
गीतों की मधुशाला।
5
दिल कितना बेमानी
समझ नहीं पाता
मन है बहता पानी ।
6
अब आए ना चैना
दो पल ठहर ज़रा
छवि तकते है नैना ।
7
हमको तो पाना है
दो पल का जीवन
कब तुमने जाना है ।

-0-

Saturday, January 11, 2014

शीत लहर

डॉ सुधा गुप्ता
हेमन्त चक्रवर्ती
1
शीत लहर:
कोहासे का क़हर
प्राण हरती
हवा है विषकन्या
हेमन्त चक्रवर्ती !
-0-

ख़बर
2
नदिया जमी
बाबुल की खबर
नहीं जो मिली !
मन ही मन रोती,
दुनिया कहे सोती ।
3
शीत की मारी
ठिठुरी हैं ख़बरें
छतें वीरान
मासूम बेज़बान
कमरों में  क़ैद हैं ।
4
शीत - ठिठुरी
ख़बरें हैं बेचारी
ओस में भीगी 
लावारिस पड़ी  हैं
बन्द दरवाज़े पे !
-0-
सर्वहारा
5
घिरी  जो घटा
सूरज डर, छिपा,
झुग्गी का बच्चा 
शीत से बड़ा रोया
धूप का कोट खोया ।


6
आ जमा हुए
बुझी भट्टी के पास,
ताप की आस-
बेघर, लावारिस
आदमी और  कुत्ते ।
7
रैन- बसेरा
न अलाव –सहारा
रात बिताई
माघ- नभ के तले
तय था मर जाना ।
8
दीन सूरज
मार खा तुषार की
दूर जा छिपा
ठिठुरे खड़े दिन
भीगे कपड़े –लत्ते !

-0-