Tuesday, October 15, 2013

धूप- मेह में

भावना सक्सैना








1-चोका

बढ़ती भीड़ 
उमसते जीवन 
थके कदम 
पल- पल जलते
आहें भरते  
तो भी चलें सतत
धूप-मेह में,
बना महानगर
महानरक 
हुई कड़ी तपस्या 
जीवन की डगर
 2-ताँका
गम के पल 
खुशियों -भरे जो भी
लम्हे असंख्य 
गुज़र जाते सब 
वांछित- अवांछित।

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5 comments:

shashi purwar said...

bhavna ji bahut sundar tanka aur chokha , hardik badhai aapko

ज्योति-कलश said...

आज का कटु यथार्थ कहती प्रभावी रचनाएँ !!

manukavya said...

धूप-मेह में,
बना महानगर
महानरक

Bhavna ji aapne ekda sachchi tasveer dikha di mahanagron ki ...

लम्हे असंख्य
गुज़र जाते सब
वांछित- अवांछित।

yahi to sach hai jeevan ka din sukh bhare hon ya dukh bhare .... gujar hi jaate hain,.... na ye rahe na wo rahenge ......

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

Anita (अनिता) said...

महानगर की पीड़ा, महानगर की त्रासदी का बहुत सुंदर चित्रण!
हार्दिक बधाई भावना सक्सेना जी!

~सादर
अनिता ललित