Friday, July 12, 2013

मानव मन

भावना सक्सैना

मानव मन
अथाह समंदर,
छिपे रहस्य
भेद अनसुलझे;
गहन रोष
हैं छिपे असंतोष ।
कितने दर्द,
असंख्य बवंडर।
गूढ़ पहेली,
कोई बूझ न पाए।
जितना बूझें
बस उलझी जाए
है सदा भरमाए ।
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2 comments:

Subhash Chandra Lakhera said...

भावना जी ! जीवन की जटिल गुत्थियों में उलझा मानव मस्तिष्क स्वयं कितना जटिल है - इस प्रश्न से साक्षात्कार कराता
आपका यह चोका बेहद खूबसूरत है। आपको हार्दिक बधाई !

KAHI UNKAHI said...

बिलकुल सत्य है...मानव मन ऐसा ही गूढ़ है...|
बधाई...|
प्रियंका