Friday, July 12, 2013

पुलकित है धरती

शशि पुरवार
1 
था दुःख को तो जलना
अब सुख की खातिर 
है राहो पर चलना ।
2
रिमझिम बदरा आए
पुलकित है धरती
हिय मचल मचल जाए । . 
3
है  मन जग का मैला 
बेटी को मारे 
पातक दर-दर फैला ।
4
इन कलियों का खिलना 
सतरंगी सपने 
मन पाखी- सा मिलना ।
5
थी जीने की आशा 
 थाम कलम मैंने
की है दूर निराशा ।
6
अब काहे का खोना
बीते ना रैना 
घर खुशियों का कोना 
7
भोर सुहानी  आई
आशा का सूरज
मन के अँगना लाई।
8
पाखी बन उड़ जाऊँ 
 संग तुम्हारे मैं

 गुलशन को महकाऊँ   

5 comments:

Subhash Chandra Lakhera said...

शशि जी ! आशा - निराशा के बीच झूलते मानव मन में उठने वाले विचारों को आप ने जिस खूबसूरती से इन रचनाओं में पिरोया है, उसके लिए आपको हार्दिक बधाई !

KAHI UNKAHI said...

बहुत सुन्दर माहिया...बधाई...|
प्रियंका

sushila said...

रिमझिम बदरा आए
पुलकित है धरती
हिय मचल मचल जाए । .

उच्छवास को कागज़ पर उकेरते सुंदर माहिया। बधाई शशि जी !

shashi purwar said...

तहे दिल से अभार सभी मित्रो को ,जिन्होने महिया को पसद किया और प्रोत्साहित किया .
कम्बोज जी सन्धु जी तहे दिल से अभार

Pushpa Mehra said...

shashi ji apke sabhi mahiya vividh - mukta sajaye hue hain. badhai
pushpa mehra.