Thursday, May 30, 2013

जेठ की धूप

-भावना कुँअर

जेठ की धूप
बनकर दुश्मन
जलाती तन
बिगाड़े सब रिश्ते।
बाज़ न आती
आग तक लगाती
न घबराती
हैं सब ही पिसते।
पूरे जंगल
धू-धू कर जलते
मूक रहते
हर दर्द सहते।
नन्हें -से पौधे
माँगते जब पानी
बनाकर वो
भाप जैसे उड़ाती।
गर्व करती
खूब ही अकड़ती
न ही थकती
पल भर में फिर
गर्म साँसें भरती।
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5 comments:

shashi purwar said...

bahut sundar waah badhai bhavna ji

KAHI UNKAHI said...

सामयिक सुन्दर चोका के लिए बधाई...|
प्रियंका

Krishna said...

बहुत सुन्दर चोका भावना जी बधाई।

Manju Gupta said...

सुंदर चोका

बधाई

ज्योति-कलश said...

जेठ की धूप की बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...बधाई भावना जी

ज्योत्स्ना शर्मा