Thursday, May 2, 2013

मंजिल है मुस्कान


डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
 1
अरे बटोही
मंजिल है मुस्कान
नहीं अधूरी
मुक्त मना- सा बाँट
हो चाह सभी पूरी  
 2
हाट रात की
तुम भी ले आओ न !
कुछ सपने
ऊँचे और प्यारे से
मीठे ,उजियारे से
 3
गाओ रे मन
मैंने गीत सजा
यहाँ प्रीत के
कठिनाई पे जीतें
मजबूत इरादे
 4
धूप सुहानी
क्यों तमक गई हो ?
राह रोकता
देखो -मेघ रंगीला ,
कुछ तो ठंड खाओ !
-0-

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
नेह लुटाओ
या ठेस पहुँचाओ,
मर्ज़ी तुम्हारी
अपनी फ़ितरत
सिर्फ़ फूल बिछाना ।
2
लम्बा सफ़र
काँटों -भरी डगर
चलती गई
कभी नहीं झुकी माँ
झुकी आज कमर ।
-0-

5 comments:

ज्योति-कलश said...

अपनी फ़ितरत
सिर्फ़ फूल बिछाना ।...tathaa
लम्बा सफ़र
काँटों -भरी डगर
चलती गई
कभी नहीं झुकी माँ
झुकी आज कमर ।....सुन्दर मधुर भावनाओं से परिपूर्ण आपके ताँका हमारा मार्गदर्शन करते हैं ...बहुत आभार एवं ह्रदय से धन्यवाद मेरी अभिव्यक्ति को भी स्थान देने के लिए .
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Krishna said...

लम्बा सफ़र
काँटों -भरी डगर
चलती गई
कभी नहीं झुकी माँ
झुकी आज कमर ।

लाजवाब ताँका...आभार।

Dr.Bhawna said...

लम्बा सफ़र
काँटों -भरी डगर
चलती गई
कभी नहीं झुकी माँ
झुकी आज कमर ।

Maa ke rup ko bahut gahanta se abhivayakt kiya hai aapne...hardik badhai..

अरे बटोही
मंजिल है मुस्कान
नहीं अधूरी
मुक्त मना- सा बाँट
हो चाह सभी पूरी ।

bahut komal bhav ...bahut 2badhai...

Anita (अनिता) said...

डॉ ज्योत्स्ना जी, हिमांशु भैया जी ..... बहुत ख़ूबसूरत भावपूर्ण ताँका !
बहुत- बहुत बधाई !
~सादर!!!

KAHI UNKAHI said...

बहुत भावपूर्ण तांका हैं...बधाई...|