Monday, April 29, 2013

मौसम सर्द हुआ


शशि पुरवार
1
ये मौसम सर्द हुआ
तुम तो रूठ गए
जीवन बेदर्द हुआ ।
2
दिल में फिर टीस जगी 
सुप्त पड़े रिश्ते
जीवन  में आग लगी  
3
वे याद  रही कसमें 
पिय संग निभाई ,
जो वेदी पे रस्में 

4
नीला नभ ठहरा है 
सच्चा प्यार सदा 
इससे भी गहरा है ।
-0-

Thursday, April 25, 2013

किस्से रीत गए


डॉ सुधा गुप्ता
1
तारे नभ में छिटके
तेरी यादों के
आँसू पलकों अटके ।
2
विरहा का गीत न गा
थपक रही पीड़ा
अब और न आज रुला ।
3
वे किस्से रीत गए
तुझसे मिलने के
सब मौसम बीत गए ।
4
आँसू की धार बही
बोल नहीं फूटे
मन की ना एक कही ।
5
सागर था तूफ़ानी
मेरी क्या हस्ती
तिरना था बेमानी ।
6
चिड़िया जो खेत चुगे
खुश है रखवाला
धन-धन जो भाग जगे ।
7
आकाश उड़ान भरूँ
पंछी तो चाहे-
दुनिया की सैर करूँ ।
8
सुनसान डगर राही
तोड़ो सन्नाटा
आवाज़ इधर  आई ।
9
कस्तूरी खोज थके
बन-बन तुम भटके
पर पैर कहीं न रुके ।
10
ऊषा रानी आई
रजनी के आँसू
फूलों में रख लाई ।
11
सूरज तो था भोला
कैसे बदल गया
बन अनल -भरा गोला
-0-

Tuesday, April 23, 2013

छूटी सारी गलियाँ


शशि पुरवार
1
छूटी सारी गलियाँ
बाबुल का अँगना
वो बाग़ों की कलियाँ ।
2
सारे  थे दर्द  सहे
तन- मन टूट गए
आँखों से पीर बहे ।
3
थी तपन भरी आँखें
मन भी मौन रहा
थी टूट रही साँसें ।
-0-

Monday, April 15, 2013

सेदोका जुगलबन्दी

आज पहली बार त्रिवेणी पर हम सेदोका जुगलबन्दी  पेश कर रहे हैं । आशा करते हैं कि आपको हमारा यह प्रयास अच्छा लगेगा । 

1.
बीता जीवन 
कभी घने बीहड़ 
कभी किसी बस्ती में 
काँटे भी सहे 
कभी फ़ाके भी किए 
पर रहे मस्ती में ।  .............हिमांशु

रमता योगी 
नई -नई राहों पे 
यूँ ही चलता जाए 
नया सूरज 
उगता प्रतिदिन 
नए -नए आँगन । ..............सन्धु 

2 .
हज़ारों मिले 
पथ में मीत हमें 
चुपके से खिसके 
तुम - सा न था 
साथ निभाने वाला 
लौटके आने वाला । .........हिमांशु 

आया अकेला 
देखने यह मेला 
मिला साथ सुहाना 
हँसा ज़माना 
मेले में घूम-घूम 
ढूँढ़ा सुख -खिलौना । .......सन्धु 

Friday, April 12, 2013

ईर्ष्या (सेदोका)

 1.
र्ष्या की आग
लग जाए दिल में
भड़कती अखंड
होती प्रचंड
रिश्ते हों खंड-खंड
लुटे चैन आनन्द
 2.
द्वेष भट्टी में
लगे जो दहकने
प्रतिशोध की आग
भस्म विवेक
धारे विष रसना
दानव जाए जाग।
 3.
तीर लगे जो
निकल कमान से
हो जाता उपचार
तीर द्वेष का
बेंध जाए यदि, तो
नहीं रोगोपचार।
 4.
बोल को बोलो
सोच- समझ कर
बोलना हो दोधार
जाँच-परख
तुले बुद्धि- बाट से
सही नपेगा भार।
 5.
प्रतिकार की
अग्नि कभी भड़के
करती नुक़सान
शब्द बाण से
घायल होती आत्मा
हों सम्बन्ध निष्प्राण।


कृष्णा वर्मा



Tuesday, April 9, 2013

झुका दे कायनात


1-वरिन्दरजीत सिंह बराड़ (बरनाला) 
1.
दुःख हैं  ज़्यादा 
लगते रास्ते बंद 
मिले न सुख 
खुद खुलेगी राह 
लड़ दुःख के साथ ।
2 .
मालूम नहीं 
कैसे जाऊँ मैं पार ?
मुश्किल रास्ते 
हो हिम्मत का साथ 
झुका दे कायनात ।
-0--
2-डॉ•ज्योत्स्ना  शर्मा
1
रे मन तेरा
अद्भुत  व्यवहार
दीप- नगरी
है जगर- मगर
हवा पहरेदार !
 2
मोह ने बाँधा
बिछोह ने छुडाया
रिश्ते जंजीरे
मन ने पहचाना
अपना या पराया ।
 3
बोझ न ढोना
क्या हीरे और मोती
संग न जाएँ
सुन्दर कर्म भले
मुस्कान सुहाए ।
 4
बीज खुशी के
मैं बो आई थी कल
उग आएँगे
कुछ पौधे प्यारे- से
प्रेम- रस भीने -से ।
-0-

Monday, April 8, 2013

धूप बनी बिखरी।


रचना श्रीवास्तव
1
ये रूप मिला निखरी
रोज उगे सूरज
मैं  धूप  बनी बिखरी।
2
तुम आए  क्या कहना  
साँसों ने पहना
हर खुशबू का गहना 
3
दुखने  लागी अखियाँ
बरसे  ये निस- दिन
जागें  सारी  रतियाँ  ।
4
विरहा की पँखियाँ
अब तो आजा तू
हँसती  सारी सखियाँ
  ।
5
जब भी बदरा बरसे
तू हर बूँद बसा
मनवा मोरा तरसे ।
6
तू  क्यों  नाही  आवे
निर्मोही तोहे
 मोरी याद न भावे ?  
-0-
2-शशि पुरवार
1
पीड़ा फिर  क्यों  भड़की ?
भाव  सभी सोए
खोली दिल की खिड़की
2
क्या पाप किया मैंने !
गरल भरा  प्याला
हर रोज़ पिया मैंने  ।
3  
कह दो मन की बातें
छूट  नहीं जाएँ
ममता की सौगातें  
-0-



Friday, April 5, 2013

जाने क्या लाचारी


डॉ जेन्नी शबनम  
1
जाने क्या लाचारी   
कोई ना समझे    
मन फिर भी है भारी !  
2
 सन्देशा आज मिला
उनके आने का
मन में है फूल खिला !
3
दुनिया भरमाती है  
अजब पहेली है  
समझ नहीं आती है !
4
मैंने दीप जलाया,   
जब भी तू आया 
मन ने झूमर गाया  ! 
5
 चुपचाप हवा आती  
थपकी यूँ देती , 
ज्यों लोरी है  गाती  !
-0-

Wednesday, April 3, 2013

वो याद तुम्हारी थी ( माहिया)


डॉ• ज्योत्स्ना शर्मा
1
कल भीग गए नैना
चाहा था उड़ना
खामोश हुई मैना ।
2
टुकड़ों का मोल नहीं
माँ-बाबा खातिर
दो मीठे बोल नहीं ।
3
फूलों ने यारी की
थी बदनाम हवा
झरना लाचारी थी ।
4
है रात नशीली- सी
छेड़ गई मन को
इक याद रसीली -सी ।
5
बादल में चाँद छुपा
ये निर्मोही मन
मेरे रोके न रुका ।
6
कलियों की क्यारी थी
चटकी थी मन में
वो याद तुम्हारी थी ।
7
धड़कन ने छंद बुने
छलक गई गागर
जग रस-मकरंद चुने ।
-0-