Friday, January 4, 2013

व्यथाएँ



डॉ उर्मिला अग्रवाल
1-आ मिला चाँद

चाँद गया है
मावस से मिलने
साथ ले गया
बारात सितारों की
ध्रुव तारे को
है टाँका पगड़ी में
कुर्ता पहना
झिलमिल करता
सजा रही है
सेहरे की लडि़याँ
रजनीगंधा
सुरभित है सब
धरा आसमां
अमावस रात को
आ मिला चाँद
जिसको जीवन में
कोई न चाहे
उसके आँचल में
आ छिप गया चाँद।
-0-
2- अकेलापन

बीमार हूँ मैं
पर पास न कोई
अकेलापन
धारण करता है
कितने रूप
ये मैंने आज जाना
कविताओं में
रोमानी लगता है
तन्हाई शब्द
पर हकीकत में
होता है यह
कितना भयंकर
इसकी पीड़ा
कोई भुक्तभोगी ही
जान सकता
विचलित करती
आहेंकराहें
तोड़तोड़ डालती
यह तन्हाई
छेदछेद डालती
सोचती है क्यों
छोड़ के चले जाते
वृद्धावस्था में
सब अपने हमें
पता नहीं क्यों
कलेजे के टुकड़े
बेटेबेटियाँ
भूले से न पूछते
कि माँ कैसी हो
काँपते देखकर
ये बूढ़े हाथ
वे मुँह फेर लेते
वितृष्णा होती
झुर्री भरे हाथों से
उन बच्चों को
जिन्हें सहलाया था
जागजाग के
रात और दिन इन
ममतालु हाथों ने।
-0-

4 comments:

KAHI UNKAHI said...

कविताओं में
रोमानी लगता है
तन्हाई शब्द
पर हकीकत में
होता है यह
कितना भयंकर
इसकी पीड़ा
कोई भुक्त–भोगी ही
जान सकता
बहुत सच...बधाई...|

ज्योति-कलश said...

जीवन का कटु सत्य कहती पंक्तियाँ ..मन को छू गईं !
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Krishna Verma said...

जीवन की वास्तविकता व्यक्त करता सुन्दर चोका।
उर्मिला जी बहुत बधाई।

ऋता शेखर मधु said...

कटु सत्य कहती...मार्मिक अभिव्यक्ति !!
उर्मिला अग्रवाल जी को बधाई !!