Monday, January 28, 2013

धरा पीत वसना



डॉ ज्योत्स्ना  शर्मा
1
सुरभित- सी
पवन ,ले अनंग
धरा पीत वसना
हे ऋतुराज !
कुहू ,पिक पुकारे -
स्वागत है तुम्हारा !
2
चंचल हवा
धीरे से पत्तियों से
जाने क्या कह जाएँ ,
झूम ही उठें
ये शांत तरुवर
लजा गईं लताएँ !
3
ओह नियंता !
नियमों में बँधे हैं
सतत तुम्हारे ही 
गतिमान हैं
धरा ,चाँद व तारे
ये  प्रकाशमान हैं !
4
समय-चक्र
अनवरत चला
प्राप्य सभी को मिला,
सुख औ' दुःख
क्रम टाला न जाए
सहना ,जो भी आए ।

2 comments:

Subhash Chandra Lakhera said...

चारों सेदोका बेहद खूबसूरत और अर्थवान ! आपको हार्दिक बधाई ! - सुभाष लखेड़ा

Swyam Shankar said...

Sabdo ka tana bana bana apna jeevan suhanaa ...aur ye basant prakat karti jeevan ki susma.......aapko hardik badhai......bahut achchi rachna