Saturday, December 8, 2012

निष्पलक नयन


कृष्णा वर्मा
1
लिपटी रहीं
स्मृति -परछाइयाँ
कभी डसतीं
कभी सहला जातीं
अजब रानाइयाँ।
2
मीठी स्वप्निल
मदमाती स्मृतियाँ
बेताब सुनूँ
सरिता का सुस्वर
होंठों पे लिये हास।
3
राह निहारे
निष्पलक नयन
हो के उन्मन
किसकी स्मृतियों में
सुलगा तन-मन।
4

रिमझिम
अँगना ना बरसो
सजन बसे
सात समुद्र पार
उठे जिया में ज्वार।
5
मौन गगन
जब चाँद हँसे ,ले
पूनो बाहों में
टूटे बाँध जिया का
मिलने की चाहों में।
6
पूनो में भीगी
मादक रात जब
शरमा जाए
प्रिय तुम्हारी याद
रह-रह के आए।
7
बही समीर
अंबुज लहरों पे
डोलता साया
पाश लिए पूनो को
मुग्ध चाँद बौराया।
8
घन गरजे
बसे दूर सजन
प्रिया अकेली
दुष्ट हवा करे
लटों से अठखेली।
-0-


6 comments:

sushila said...

जितने सुंदर भाव उतना ही सुंदर शब्द-संयोजन ! बधाई उत्कृष्‍ट सृजन के लिए कृष्णा वर्मा जी !

Anupama Tripathi said...

भाव प्रबल एवं मनोहारी तांका...शुभकामनायें कृष्णा जी ...

युग-चेतना said...

Sundar

युग-चेतना said...

Sundar

KAHI UNKAHI said...

सुंदर...बधाई कृष्णा वर्मा जी...|

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर ,सरस मधुर भावाभिव्यक्ति ....बहुत बधाई एवं शुभ कामनाओं के साथ ....ज्योत्स्ना शर्मा