Thursday, December 20, 2012

तारों का मेला



 शशि पाधा
1
सन्ध्या की वेला है
नीले अम्बर में
तारों का मेला है ।
2
लहरें क्या गाती हैं
चंदा रोज़ सुने
क्या राग सुनाती हैं ।
3
अमराई छाई है
खुशबू के झोंके
पुरवा भरमाई है  ।
4
पागल मन झूम रहा
सावन की बूँदें
अधरों से चूम रहा
5
मन को समझाओ तो 
पंछी -सा उड़ता
क्या रोग बताओ तो  ।
6
हर बात छिपाते हो
कैसा रोग हुआ
क्यों वैद बुलाते हो ?
7
छन छन झंकार हुई
पायल तेरी थी
मेरी क्यों हार हुई  
8
तुम जीतो तो जानें
छम छम की भाषा
समझो तो हम मानें  
9
मन- पीड़ा झलक गई
नैनों की गगरी
कुछ काँपी, छलक गई ।
10
कंगना क्या बोल रहा
भेद कलाई के
धीमे से खोल रहा  
11
देहरी पर दीप धरूँ
पाहुन  आन खड़े
नैनों में हास भरूँ  
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3 comments:

ज्योत्स्ना शर्मा said...

कोमल भावों से परिपूर्ण सुन्दर मधुर माहिया ...बहुत बधाई आपको !!

sushila said...

बहुत ही भावपूर्ण और सुंदर माहिया। बधाई शशि जी !

गीता पंडित said...

छन छन झंकार हुई
पायल तेरी थी
मेरी क्यों हार हुई ।

बहुत सुंदर सहज और सरल ..
बधाई शशि दी..