Friday, November 23, 2012

जीवन ठहर गया


सुदर्शन रत्नाकर

1

ये नदियाँ बहती हैं

सागर से मिलने

कितने दु:ख सहती हैं ।


2

काजल की रेखा है

आगे क्या होगा

किसने यह देखा है ?

3

ये बंधन झूठे हैं

क्यों विश्वास करूँ

साजन जो रूठे हैं  ।

4

आशा अब टूट गई

जीवन ठहर गया

साँसें  जब छूट गई ।

5

यूँ मत समय गँवाओ

जब तक साँसें हैं

कुछ तो करते जाओ ।

6

तुम क्यों दु:ख सहते हो

मत अभिमान करो

साथ नहीं रहते हो ।

7

सूरज तो डूबेगा

घबरा मतसाथी

चन्दा भी निकलेगा ।

8

तुम भी तो कुछ बोलो

मिलकर रहना है

विष दिल में मत घोलो

9

पाखंड रचाते हो

दिल में रब तेरे

क्यों मंदिर जाते हो ?

10

मुश्किल तुमको पाना

नींद  नहीं टूटे  

सपनों में आ जाना ।

11

चाँद सजी रातें हैं

आकर मिल साथी

कहनी कुछ बातें हैं

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3 comments:

KAHI UNKAHI said...

पाखंड रचाते हो
रब तेरे दिल में
क्यों मंदिर जाते हो ?
बहुत सुन्दर...बधाई...।
प्रियंका

Manju Gupta said...

जीवन के अनुभवों से सजे सार्थक , सुंदर माहिया . बधाई .

Anupama Tripathi said...

जीवन गाथा कहते ...अर्थपूर्ण एवं भावपूर्ण महिया ....बधाई सुदर्शन जी ...