Sunday, October 21, 2012

चाँदनी रात /पिंजरे का दु:ख


1-चाँदनी रात --रेनु चन्द्रा
चाँदनी रात
शीतल पवन है
पूनम चाँद
आज रात शर्माया
छुपता रहा
बादलों में जाकर
मन की बात
वह झट से कह
झील में जा उतरा।
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2-पिंजरे का दु:ख -रेनु चन्द्रा 
उदास मन
वो सदा रहती है
विचलित हो
पंख फड़फड़ाती
उड़ ना पाती
मन तड़फ जाता
मैना को तो ये
पिंजरे का दु:ख ही
रुला जाता है
उन्मुक्त आकाश में
उड़ने को  ही
उसका दु:खी मन
सदा छटपटाता ।
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4 comments:

ऋता शेखर मधु said...

दोनो चोका अच्छे लगे|...एक भावपूर्ण और दूसरा कठोर सत्य
रेनू चन्द्रा जी को बधाई|

Krishna Verma said...

दोनो चोका बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

KAHI UNKAHI said...

उदास मन
वो सदा रहती है
विचलित हो
पंख फड़फड़ाती
उड़ ना पाती
मन तड़फ जाता
मैना को तो ये
पिंजरे का दु:ख ही
रुला जाता है
उन्मुक्त आकाश में
उड़ने को ही
उसका दु:खी मन
सदा छटपटाता ।
दोनो चोका बहुत सुन्दर...यह वाला बहुत मार्मिक लगा... बधाई...।

ज्योति-कलश said...

चाँदनी रात के चाँद ..और ..पिंजरे की मैना ...दोनों की मन: स्थिति को बहुत सुंदरता से कहते सेदोका के लिए बहुत बधाई ...रेनु चंद्रा जी
सादर ..ज्योत्स्ना शर्मा