Thursday, September 13, 2012

अकेली चली (सेदोका)



3-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
श्रेया श्रुति
1
अकेली चली
हवा मन उदास
कितनी दुखी हुई
साथी जो बने
चन्दन औ' सुमन
सुगंध सखी हुई ।
2
मन से छुआ
अहसास से जाना
यूँ मैंने पहचाना
मिलोगे कभी
इसी आस जीकर
मुझको मिट जाना ।
3
बूँद बूँद को
समेट कर देखा
सागर मिल गया
मैं सींच कर
खिला रही कलियाँ
चमन खिल गया ।
4
जीवन-रथ
विश्वास प्यार संग
चलते दो पहिये
समय -पथ
है सुगम ,दुखों की
बात ही क्या कहि
-0-
4-सुदर्शन रत्नाकर
1
मौसम होते
मेरे तुम्हारे लिए
नहीं उनके होते
रहते हैं जो
नंगे बदन सदा
सर्दी -बरसात में ।
2
चलती रही
हर क़दम साथ
तब मैं तुम्हारी थी,
अवहेलना
रास नहीं आई तो
रिश्ते दरक गए  ।
3
साथ चलते
कभी नहीं मिलते
दोनों नदी किनारे,
सदियों से है
बहता आए पानी
फिर भी वे तरसें ।
4
अथाह जल
दूर तक फैलाव
अनमोल खजाना
सब कुछ है
सागर तेरे पास
फिर भी विचलित ।
5
मेरे हिस्से में
आईं रुसवाइयाँ
चलो कबूली मैंने,
इतना सही
कुछ मिला तुमसे
मैं तो नाउम्मीद थी ।
-0-

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