Saturday, August 11, 2012

वंशी यूँ कहे (सेदोका)



कृष्णा वर्मा   , रिचमण्ड हिल (कनाडा)
1
क्यों रे कान्हा
क्यों छेड़े ऐसी तान
सुध-बुध बिसरा
दौड़ें गोपियाँ
अदृश्य डोर- संग
वशीभूत हो जाएँ।
2
वंशी यूँ कहे-
‘लग श्याम अधर
गया जन्म सुधर
मैं तो थी बाँस
भरी हरि ने साँस
बजे सुर साज।
3
पगली राधा
सुन वंशी की तान
खोती जाए है प्राण
दौड़ी मधुबन
पूछे वृक्ष पात
कहाँ लुके हैं कांत।
4
माखन चोर
माथे मोर- मुकुट
पाँव में पैंजनियाँ ,
मोहती मन
माथे बिखरी लट
अधर-मधु -घट।
5
होतीं अधीर
यमुना जी के तीर
श्री चरण पखार
पाएँ आशीष
सुन मुरली -तान
दौड़ें गोपियाँ- ग्वाल।
6
नटखट
चंचल चितवन
हरे मन का चैन
श्यामल तन
दमके हैं कुण्डल
किया मन बेकल।
-0-

7 comments:

Rajesh Kumari said...

भक्तिमय सेदोका ...वाह सभी एक से बढ़ कर एक -----बहुत बधाई आपको

sushila said...

वाह ! कितने भावप्रवण सेदोका और कितना सुंदर शब्द-संयोजन ! पढ़कर आनंद आ गया कृष्णा वर्मा जी ! बहुत-बहुत बधाई इस मोहक सृजन के लिए!

ज्योत्स्ना शर्मा said...

सभी सेदोका बहुत सुंदर ...श्री कृष्ण की लीलाओं को साकार करते हुए से ...मोहक प्रस्तुति ...बहुत बधाई कृष्णा वर्मा जी

उमेश महादोषी said...

भक्ति-भाव से सराबोर हैं कृष्णा जी के ये सेदोका. बधाई!

KAHI UNKAHI said...

बहुत सुन्दर...। कृष्णा जी को मेरी बहुत बधाई...।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

सुन्दर प्रस्तुति, कृष्णा जी को बधाई.

Dr.Bhawna said...

Sundar prastuti...