Monday, August 27, 2012

प्रीत साँची हमारी -चोका ( वर्षा ॠतु)



1-प्रीत साँची हमारी 

तुहिना रंजन

नैनों में छिपे 
सावन -भादो सब
बरसा किए 
तोहे  याद करके ,
मेघा जलाए 
बूँदें भी तड़पाएँ  
तुम्हरे बिना ,
जिया न लागे हाय !
ओ परदेसी !
बदरा संग भेजूँ 
प्रेम की पाती ;
पढ़ते आ जइयो 
आओगे जब, 
लिपट तोसे तब 
भीजूँ तो संग  
बहे चूनर रंग ,
जाऊँगी वारी ;
प्रीत साँची हमारी 
भूल न जाना ,
ये बिरहा की मारी 
तके राह तिहारी 

-0-
2-श्यामल मेघ
-डॉ अमिता कौण्डल

श्यामल मेघ
रिमझिम- सी बूँदें
मधु संगीत
भीगा घर आँगन ।
मन बाबरा
गुनगुनाए जैसे
मधुर गीत ।
हृदय आनन्दित
ज्यों माँ -स्नेह से ,
बूँदों की शीतलता
शिशु स्पर्श -सी
वर्षा ऋतु -आनन्द
छाया है चहुँ ओर ।
-0-
ओ घन श्याम !
3- डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

ओ घन श्याम !
मुदित अभिराम
सजल हुए
धरा पर बरसे
और कभी यूँ
मिलने को तरसे ।
कौन सिखाता
सारी तुम्हें ठिठोली ?
सखी तुम्हारी
पुरवाई क्या बोली ?
भटकाती है
संग तुमको लेके
भला कहो तो
कित- कित है जाती
ज़रा तो जानो ।
कण -कण व्याकुल
तुम्हारे बिना
तुम न पहचानो ।
और कभी ये
मुक्त भाव से भला
कौन संदेसा 
नदिया से कहते ?
उमड़ी जाती
वो बहते -बहते
सखा हमारे
हमें न भरमाओ
अब मान भी जाओ ...!!
-0-

4-रसधार से भर !
डॉ सरस्वती माथुर

वर्षा ऋतु में
पात के झरोखों से
झाँकती बूँदे
शाखाओं पे झूमती
पुरवा संग
संगीत हैं बनाती
पाखी स्वरों को
साथ मिला करके
रसीला गातीं
मेघ ढोल बजाते
दामिनी छेड़
ऑर्केस्ट्रा के तारों को
धरा पे आती
बुलबुल- कोयलें
हर ताल पे
खूब साथ निभातीं
भँवरे गाते
फूल तितली-संग
नृत्य दिखाते
रसधार से भर
गुन-गुन हैं गाते ।
-0-

( प्रस्तुति -डॉ हरदीप कौर सन्धु )

ओ काले मेघा -चोका ( वर्षा ॠतु)

5-बेरंग सावन
 -मंजु गुप्ता

वर्षा की झड़ी 
करती  मन  खिन्न 
गिरी दामिनी 
मेरे मनोभावों पे
करे  प्रहार 
 म्लान लगे प्रकृति 
ताना दे फूल 
शापित लगे जग 
शूल चुभाते
भूला न पाती छवि 
पी मिलन की 
हे मेघ ! ले जा 
विरह का संदेशा 
पिया के पास 
सतरंगी सावन 
लगता  है बेरंग  
-0-

6- पगलाया बारिश का मौसम
- रेनु चन्द्रा
पानी बरसा
बरसता ही रहा
बरसात ने
फिर कहर  ढाया
जलमग्न हो
डूबा शहर सारा ,
सड़कें बनीं
बहती हुई धारा ।
।छतें हैं टूटीं
बरबाद हैं घर
जन-जीवन
गया सब बिखर
मुझे यूँ लगा
पगलाया शायद
बारिश का मौसम।
-0-
7-ओ काले मेघा 
-दिलबाग विर्क 
प्यासी धरती
तड़पे दिन रात
ओ काले मेघा !
सुनो जरा पुकार
छा जाओ तुम
ढक लो आसमान 
चाहते सभी
ठंडी-ठंडी फुहार 
हो हरियाली
पात-पात  मुस्काए
सूनी धरा का
कर देना उद्धार 
तपन मिटे
मादकता छा जाए 
अंग- अंग पे
चढ़े नया खुमार 
ओ काले मेघा
बरसो छ्माछ्म 
देना ये उपहार
-0-
(प्रस्तुति-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’)

Monday, August 20, 2012

ये खामोशियाँ ( चोका)


 डॉ भावना कुँअर

ये खामोशियाँ
डुबो गई मुझको
दर्द से भरी
गहन औ अँधेरी
कोठरियों में।
गूँजती ही रहती
मेरी साँसों में
प्यार -रंग में रंगी
खुशबू भरी
जानी पहचानी -सी
बावरी धुन।
छलिया बन आए
चुरा ले जाए
मेरे लबों की हँसी
दे जाए मुझे
आँसुओं की सौगात
कैसा अजीब प्यार !

तुमने कहा( चोका)

 -डॉ. अमिता कौण्डल
                          
तुमने कहा -
मैं खुश हूँ  बहुत
कहो प्रीतम
कब देखा तुमने
सूरजमुखी
खिलता सूर्य  बिना
देखा है कभी   ?
प्रियवर  तुमने
 बिन जल के
मछली को जीवित
तुम ही तो हो
मेरी सारी खुशियाँ
जब से मोड़ा
तुमने मुखड़ा ये
एकाकी हूँ मैं
माटी -रची काठ को
जिन्दा रखा है
कि कभी होगी तुम्हें
मेरी भी सुध
मैं और तुम होंगे
इस जन्म  में "हम" 
 -0-

Wednesday, August 15, 2012

रानी लक्ष्मीबाई (चोका )


सुशीला शिवराण

स्वाधीनता का
था पहला संग्राम
सत्तावन में
बजी थी रणभेरी
झाँसी की रानी
अनोखी जो मिसाल
देशभक्‍ति की
क्या खूब वो मर्दानी
तांत्या टोपे को
लेके अपने साथ
बाँध शिशु को
अपनी पीठ पर
कूद पड़ी थी
आज़ादी के रण में
दिव्य तेज था
झाँसी जान से प्यारी
अस्‍त्र-शस्‍त्र में
थी बहुत निपुण
भीषण युद्ध
ह्‍यूरोज़ घबराया
गया, लौटा वो
लेके असला
और दुगुनी फ़ौज
टूट पड़ा रानी पे
नारी सेना ने
ऐसा शौर्य दिखाया
भौंचक्‍क शत्रु
तोप, गोलियों साथ
लड़ रहा था
किंतु निर्भय रानी
वो रणचंडी
शत्रु को काट रही
ले तलवार
रण यह
भीषण
लड़ा गया था
झाँसी की आज़ादी का
छुड़ाए छक्‍के
अंग्रेज़ हक्‍के-बक्‍के
टूट पड़े वे
मिलकर रानी पे
ज़ख्‍मी रानी को
लेकर
दौड़ा घोड़ा
कर न पाया
वह नाले को पार
आया करीब
दुश्‍मन पीछे-पीछे
दबे पाँव था
कहा लक्ष्मीबाई ने
ओ झलकारी !
देखो वह कुटिया
उसमें चलो
जलाओ मेरी चिता
शत्रु तन को
देखो छू भी न पाए
कैदी नहीं मैं
मरूँगी आज़ाद ही
न्यौछावर जां

करके  जाऊँगी मैं
अपनी झाँसी पे
झलकारी ने शीघ्र
माना रानी का
आखिरी वो आदेश
लगाई आग
धू-धू जलती चिता
देख अंग्रेज़
रहे मलते हाथ
दिव्य ज्योति वो
मिली दिव्य ज्योति से
बनी मिसाल
वह देश-प्रेम की
नमन तुम्हें
सुनो ओ वीरांगना
मेरी तुम आराध्या !
-0-


भारत गाथा


 1-स्वतंत्रता दिवस (चोका) -   ज्योतिर्मयी पन्त
 भारत गाथा
 अप्रतिम  स्वदेश
 स्वर्ण चिरैया
 मोहे सब का मन
 सदियाँ बीती
आक्रामक  विदेशी
बर्बर बन
लूटते रहे जन
कोई व्यापारी
बनके आया यहाँ
लो धीरे- धीरे
सरताज हो गए
ले लिया राज
अपने ही हाथो में
हम गुलाम
वे भाग्य निर्णायक
धन दौलत
कोहिनूर रतन
सब उनके
प्रजा प्रताड़ित हो
मूक विवश
अपने ही घर में
आत्मा जो जागी
बिगुल बज उठे
स्वतंत्रता  के
मंगल पांडे वीर ,
लक्ष्मीबाई ने
 जो  अलख जगाई
क्रांति हो उठी,
भगत सिंह साथी
विस्मिल और
आज़ाद चढ़े फाँसी 
नेता सुभाष
वीर हजारों हुए
शहीद यहाँ
कालापानी की सजा
गले लगाई
गाँधी के साथ
सत्य अहिंसा -पथ
चले दीवाने
आज़ादी तब  पाई 
इसका मोल
समझें हम सभी
रक्षा कर्तव्य
तिरंगे की शान हो
हमारी आन
स्वप्न हों पूरे सभी
शत्रु न आये  कभी .


-0-
2- झंडा तिरंगा! (चोका)
- डॉ सरस्वती माथुर

दीप्त रख के
अहिंसा- मशाल को
झंडा तिरंगा
आज भी बाँचे गाथा
देके सन्देश
देश- प्रेम, शान्ति का
हमारी शान
न्यारा झंडा हमारा
केसर रंग
शान्ति दूत- सफ़ेद ,
हरे के संग  
है मधुमय न्यारा
भारत देश प्यारा !
-0-

Saturday, August 11, 2012

वंशी यूँ कहे (सेदोका)



कृष्णा वर्मा   , रिचमण्ड हिल (कनाडा)
1
क्यों रे कान्हा
क्यों छेड़े ऐसी तान
सुध-बुध बिसरा
दौड़ें गोपियाँ
अदृश्य डोर- संग
वशीभूत हो जाएँ।
2
वंशी यूँ कहे-
‘लग श्याम अधर
गया जन्म सुधर
मैं तो थी बाँस
भरी हरि ने साँस
बजे सुर साज।
3
पगली राधा
सुन वंशी की तान
खोती जाए है प्राण
दौड़ी मधुबन
पूछे वृक्ष पात
कहाँ लुके हैं कांत।
4
माखन चोर
माथे मोर- मुकुट
पाँव में पैंजनियाँ ,
मोहती मन
माथे बिखरी लट
अधर-मधु -घट।
5
होतीं अधीर
यमुना जी के तीर
श्री चरण पखार
पाएँ आशीष
सुन मुरली -तान
दौड़ें गोपियाँ- ग्वाल।
6
नटखट
चंचल चितवन
हरे मन का चैन
श्यामल तन
दमके हैं कुण्डल
किया मन बेकल।
-0-