Tuesday, July 31, 2012

मुट्ठी में बंद


डॉo जेन्नी शबनम

मुट्ठी में बंद
कुछ सुहाने पल
ज़रा लजाते 
शरमा के बताते
पिया की बातें
हसीन मुलाकातें 
प्यारे-से दिन 
जग-मग-सी रातें
सकुचाई-सी
झुकी-झुकी नज़रें
बिन बोले ही
कह गई कहानी
गुदगुदाती
मीठी-मीठी खुशबू
फूलों के लच्छे
जहाँ-तहाँ खिलते 
रात चाँदनी
अँगना में पसरी
लिपट कर
चाँद से फिर बोली -
ओ मेरे मीत 
झीलों से भी गहरे
जुड़ते गए
ये तेरे-मेरे नाते
भले हों दूर
न होंगे कभी दूर    
मुट्ठी ज्यों खोली
बीते पल मुस्काए
न बिसराए 
याद हमेशा आए
मन को हुलासाए !

- जेन्नी शबनम (जुलाई 30, 2012)

Saturday, July 28, 2012

आँसू जब बहते हैं


    रामेश्वर काम्बोज हिमांशु‘ और डॉ हरदीप कौर सन्धु  के  माहिया अनुपमा त्रिपाठी जी के स्वर में सुनने के लिए  क्लिक कीजिए आँसू जब बहते हैं को

डॉ हरदीप कौर सन्धु का माहिया-
शब्दों का  गीत बना
अँखिया राह तकें
तू दिल का मीत बना ।
प्रस्तुति-डॉ हरदीप कौर सन्धु

Friday, July 27, 2012

पावस बहुरंगी



डॉ सुधा गुप्ता



पहली वर्षा
बूँदों की चित्रकारी
धूलि के रंग
छिप कर बैठी है
नीली चिड़िया
फूलों के झुरमुट 
ताल पै फैले
घने जल-कुंतल
तैरती मीन
सखियाँ लिये साथ
घास चुप है
फुदक के हिलाता
हरित टिड्डा
नन्हीं बीर-बहूटी
शनील बूँद 
बारिश संग गिरी
आकाश-छत
छेदों भरी छतरी
टपक रही 
फाख़्ता टेरती घूँ-घूँ
बोल रही है
निर्जन दोपहरी

सावन-धूप 
दोपहरिया-फूल
चटख़ लाल
पूरब की खिड़की
उषा पहने
गोटा लगी ओढ़नी
घिरीं घटाएँ
छत पर मोरनी
टहल रही
भादों जो आया
जल-बालिका खेल
ने जी डराया
भर गए हैं ताल
निखरा रूप
पुरइन के पात
शोख़ अनूप
शैशव की क्रीड़ाएँ
फिर शुरू हैं
तैरीं कागज़-कश्ती
वर्षा विनोदीः
कहीं पुए-पकौड़ी
कहीं है भूख
न छदाम न कौड़ी
पावस बहुरंगी
-0-



Wednesday, July 25, 2012

फूलों -सी बातें(माहिया)


डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
दरिया में पानी ना
क्यूँ अब रिश्तों में   
वो बात पुरानी ना ।
2
खुशियों का रंग हरा
तुम जो बरस ग
तन धरती का निखरा।
3
खुशियों का रंग भरा   
तेरा साथ मिला  
मन गीतों का निखरा ।
4
होनी तो होती है
कल की क्या चिंता
"रब है" क्यूँ रोती है ।
5
वो ऐसा गाती थी
 फूलों -सी बातें
 खुशबू- सी आती थी ।
6
कल तीज पडे़ झूले  
सजना 'वो' सजना
हम अब तक ना भूले
-0-

Monday, July 23, 2012

मनोहर लतिका


डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
1.
बूँदबूँद से
झरकर ममता
भर देती गागर,
उर सरिता
ऐसी गति पाकर
आज हुई सागर!
2
बिना बुलाये
दलबल लेकर
घूम रहे बादल,
दिशावधू के
नयन हँस रहे
लगालगा काजल।
3
डाली लिपट
मनोहर लतिका
झूमझूम मुस्काए,
माँ की ममता
तबतब मुझको
याद बहुत आए।
4
चन्द लोगों ने
जिनकी आबरू को
है तारतार किया,
सच बताऊँ,
मैंने उन फूलों से
हमेशा प्यार किया! 

Sunday, July 22, 2012

बजा जलतरंग


1- डॉ अनीता कपूर
1
फिर ख़्वाहिशें
ओढ़ ली सारी मैंने
रंगीली चादर-सी
तलाश रही
वह इंद्रधनुष
जिसने भेजे रंग
बाँघुँघरू
छम -छम करती
वर्षा अल्हड़ नार
कर फुहार
गाती रही नग़में
बजा  जलतरंग
आओ बना लें
वो पाँचवाँ मौसम
प्यार -भरा मौसम
बरसे जहाँ
सिर्फ प्यार की वर्षा
गंगा-की  धारा जैसे ।
अलबेली-सी
जीवन की  चिरैया
किस डाल को काटें ?
नोचें किस को
तितली बनी कभी 
चिरैया जीवन की ।
5
जिंदा रखना
अगर रिश्तों को तो
देदो उन्हे भी साँस
न हो गणित
कोई लेन-देन का
शून्य की दरकार ।
6
ठहरे पल
हमेशा ढोते सच
दौड़ता हुआ वक्त
कभी भागता
खिड़की से बाहर
कभी आता अंदर
-0-
2-कमला निखुर्पा
1
सोंधी-सी हवा
गुनगुनाके कहे-
भिगो गया मुझको
पागल मेघ
ढूँढ़ रही मैं उसे
संग मेरे ढूँढ़ो रे !
2
मेघों के दल
उमड़े गगन में
बज रहे नगाड़े
मस्त पवन
पपीहरा पुकारे
पी सावन आयो रे !
3
पूनो का चाँद
चमका गगन में
उमड़ा समन्दर ,
भावों का ज्वार
फिर बहा ले चला
सपनों का संसार ।
4
बहाती रही
वक़्त की धारा हमें
बहते चले चला
कहते रहे
किनारों से अपने
क्यों संगम नहीं तुम ।
5
उपमेय थी
उपमानों से घिरी
बन गई अन्योक्ति
जाना है अब
तुम रहोगे श्लेष
ढके रूप अनेक ।
-0-
3-कृष्णा वर्मा
1
नारी केवल
माटी हवा औ पानी
सदा से ही निमानी
ओर ना छोर
पीहर ना सासरा
कब मिला आसरा।
2
अनूठी कृति
प्रकृति भेंट नारी
तापे जीवन आँच
बन सुराही
बुझाती रहे प्यास
रिसे औ दे ठंडक।
3
माँ जो पालती
सुनहरी धूप में
खिलती सूर्यमुखी
पली छाँव में
बन के रह गई
घर का मनीप्लांट।
4
रात की चुप्पी
दिल की नगरी पे
यादें करें शासन
हरें नींद को
सुलगा के अतीत
जागने की सज़ा दें।
5
सुलग उठी
यादों की सीली काठ
तापती एहसास
घुँआ जलाए
पलकों के सपने
धोती खारे पानी से।
6
घन गरजे
पट श्यामल ओढ़
दिवस साँझ भई
प्रीत जिया में
जागी फुहार संग
भीगे नैना याद में।
-0-

Saturday, July 21, 2012

प्राण पुलकें


आचार्य भगवत दुबे
1
लेकर हवा   
चली है चतुर्दिश  
भीनी खुशबू  
पुलकित करती  
हर्षित हो धरती ।
2
प्राण पुलकें  
 उमड़-घुमड़के  
मेघा बरसे  
 धरती हरषाई   
शीतलता है छाई ।
3
र्षा ॠतु    
करती है शृंगार  
धरा नवेली  
 नदियाँ इतरातीं   
चलती  बलखाती ।
4
जलसंचय  
है माँग समय की  
पानी बचाओ
व्यर्थ  मत बहाओ  
बूँद-बूँद बचाओ ।
5
मदनगन्ध  
कहाँ से आ रही है ?
तुम आए क्या
तभी तो महके हैं
मेरे  घर-आँगन ।
6
तुम आए हो  
फूलों सा खिला दिल  
वसन्त हो क्या?
सब पर छाए हो
 सबको हर्षाए हो ।
7
आँखों में तुम
काजल -से आँजे हो   
और क्या कहूँ?  
मन में समाए हो  
हम-तुम एक हैं ।
8
भाव की गंगा  
छन्दों की पतवार  
कवि तैराक  
प्रभु तारनहार  
करवाते हैं पार ।
-0-

Tuesday, July 17, 2012

सेदोका


1-डॉ महावीर सिंह
अभी तक उपलब्ध  जानकारी के अनुसार डॉ महावीर सिंह जी के 11 सेदोका ‘मन की पीड़ा’ संग्रह में 2001 में  तथा सात सेदोका ‘प्यार के बोल’ (2002)तथा में प्रकाशित हुए  थे।  ‘मन की पीड़ा’  से इनके  5 सेदोका यहाँ दिए जा रहे हैं।
सम्पादक द्वय
1
सावन आया
गरजे काले घन
बहका गोरी -मन
कौंधी बिजली
भय से काँपा मन
लिपटी पिया संग ।
2
याद तुम्हारी
छा जाती मन पर
तनहाई में जब
मुझको पाती
सावन -घाटा सम
आँखें बरस जातीं  ।
3
कोयल कूकी
तन-मन बहका
उपवन दहका
कलियाँ फूलीं
अलि सन्देश लाया
सखि! फ़ागुन आया ।
4
गाँठें ही गाँठें
जीवन की डोर में
खुलती नहीं गाँठें
जकड़े पड़ीं
रस नहीं गाँठों में
नीरस है ज़िन्दगी ।
5
बाँधोगे यदि
हवा-पानी -ज़मीन
हवा बने अंधड़
पानी सैलाब
ज़मीन जो बाँधोगे
उठा देगी तूफ़ान ।
-0-
2-डॉ उर्मिला अग्रवाल
1
जलेंगे दीप
खो जाएगा अँधेरा
करो बस इतना-
भरके नेह
जला लो प्रेम-ज्योति
अपनी ज़िन्दगी में
2
भटके हम
कितने द्वारों पर
अपनापन पाने,
मिला न सका
कोई अपने जैसा
न ही  अपनापन ।
3
पनप  रहे
नन्हें- नन्हें -से पौधे
सींचे जा रहा माली
लिये ये आशा-
कि कभी पेड़ बन
ये हमें देंगे छाया ।
-0-