Friday, June 29, 2012

संतान- सुख



ज्योतिर्मयी पन्त

वे झुके काँधे
हाथी घोड़े बने  जो  
अंगुली थामें
चलाया  खड़ा किया 
शब्द बोलना
भावी सुख हित वे
बोझ सर पे 
जिम्मेदारियाँ सदा
ख़ुशी से लिए
हँसी किलकारी पे 
करते रहे
निछावर दिन रैन
हुए निहाल
समय करवट
झुके वे काँधे
झुर्रियाँ भरे मुख
चलें न बोलें
व्यर्थ- सा हो जीवन
आस लगाए
खोजें अपनापन
बच्चे अपने
हँसे बोले उनसे
हाथ थाम लें
चमकती लौ जैसे
क्षीण दीये में
भरें उत्साह -ओज
 संजीवनी दें
पुनर्जीवन मिले
 संतान सुख मिले ।
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1 comment:

Rachana said...

संजीवनी दें
पुनर्जीवन मिले
संतान सुख मिले ।
sahi kaha aapne bas yahi ko sanjivni hai aur kya chahte hain bujurg hamse .............
badhai
rachana