Saturday, June 23, 2012

कठपुतली


डॉ सुधा गुप्ता
कठपुतली
बाज़ार में सजी थी
ख़ुश, प्रस्तुत
कि कोई ख़रीदार
आए, ले जाए
उसके तनबँधे
डोरे झटके
हँसा, रुला उसको
रिझा, नचाए
मन मर्ज़ी चलाए
ले गया कोई
गुलाबी साफ़ा उसे
कठपुतली
खुशखुश नाचती
ख़रीदार की
भ्रूभंगिमा देख के
अपना तन
तोड़तीमरोड़ती
थिरकती थी
बल खाखा जाती थी
ऐसा करते
बहुत दिन बीते
जोड़ चटखे़
नसें भी टूट गई
बिखर गई  
वो चीथड़ाहो गई
वक्त़ की मार :
टूटीफूटी चीज़ों का
भला क्या काम ?
सो घूरेफेंकी गई
अब विश्राम में है।
 -0- 
( सभी चित्र गूगल से साभार)

15 comments:

Suresh Choudhary said...

अद्भुत मात्र इस लेखनी को अद्भुत ही कह सकता हूँ क्योंकि इतना गहन विषय चोका के माध्यम से कहना एक हिम्मत एवं साहित्य सृजनात्मक क्षमता का काम है,बधाई

KAHI UNKAHI said...

अप्रतिम...सुधा जी की सोच, उसे शब्दों में इतनी खुबसूरती से बाँध कर प्रस्तुत करने की क्षमता के आगे नतमस्तक हूँ...। इतनी गहरी बात, जो सच्चाई उन्होंने इस चोके के माध्यम से पेश की है वो सीधे कलेजा चीर गई...। आभार इस खूबसूरत रचना के लिए...।

प्रियंका

KAHI UNKAHI said...

अप्रतिम...सुधा जी की सोच, उसे शब्दों में इतनी खुबसूरती से बाँध कर प्रस्तुत करने की क्षमता के आगे नतमस्तक हूँ...। इतनी गहरी बात, जो सच्चाई उन्होंने इस चोके के माध्यम से पेश की है वो सीधे कलेजा चीर गई...। आभार इस खूबसूरत रचना के लिए...।

प्रियंका

युग-चेतना said...

पांच और सात शब्दों की सीमा में बंधकर नारी जीवन के बंधनों को अभिव्यक्ति देना ये तो सुधाजी की लेखनी ही कर सकती है ... आपकी सृजन शक्ति को प्रणाम ..

युग-चेतना said...

पांच और सात शब्दों की सीमा में बंधकर नारी जीवन के बंधनों को अभिव्यक्ति देना ये तो सुधाजी की लेखनी ही कर सकती है ... आपकी सृजन शक्ति को प्रणाम ..

amita kaundal said...

नारी जीवन का सार इस चौका में उतार दिया आपने. आपकी लेखनी हमेशा ही सार गर्भित मन को छू लेती है. बधाई.
सादर
अमिता कौंडल

Manju Gupta said...

बेजान कठपुतलियों के माध्यम से नारी जीवन के बंधनों को जागरूक किया .
बधाई .

मंजु गुप्ता .

अनंत आलोक said...

वाह मैडम सुधा जी बहुत ही सुंदर ....आमतोर पर हाइकु ,चोका का समझना बड़ा कठिन होता है लेकिन आपने इसे बड़ी कुशलता के साथ बोधगम्य बना दिया ,नारी का चित्रण अनूठा है बधाई |

ऋता शेखर मधु said...

हृदयस्पर्शी रचना...

टूटी–फूटी चीज़ों का
भला क्या काम ?
सो ‘घूरे’ फेंकी गई
अब विश्राम में है।

जीवन के अंतिम पड़ाव के लिए लिखी गई
ये पंक्तियाँ दिल को छू गई |

सादर

त्रिवेणी said...

देश के वरिष्ठ हाइकुकार आदरणीय भगवत शरण अग्रवाल जी ने यह टिप्पणी भेजी है- नारी जीवन की संपूर्ण वेदना इस लघु कविता में उभर आई है . बधाई .
भगवत सरन अगरवाल

Dr.Bhawna said...

Nari ki piida ko is trha apni lekhni men baandhkar aankhon men aasuon ka sailaab laane vaali,dil se mukh se siskiyan bharne vaali bas meri perna sudha ji hi ho sakti hain naman aapko...

निर्मला कपिला said...

नारी को कठपुतली मे इस तरह ढाला है कि पूरी ज़िन्दगी चंद श्ब्दों ने ब्याँ कर दी। बहुत खूब।

ज्योत्स्ना शर्मा said...

नारी जीवन की व्यथा कथा को अभिव्यक्त करती ...आपकी रचना मुझे अवाक् कर गई दीदी ...नमन आपको !

sushila said...

कठपुतली के माध्यम से स्‍त्री की वेदना की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्‍ति पढ़ मैं नतमस्तक हूँ।
नमन आपको और आपकी लेख्ननी को सुधा दीदी!
आप के हाइकु "कूकी जो पिकी" विभोर कर गए! आप मेरे लिए प्रेरणा हैं। बहुत सीख रही हूँ आपसे!
पुन: नमन!

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत मार्मिक रचना. कठपुतली के माध्यम से स्त्री के सच को अभिव्यक्त किया है. शुभकामनाएँ.