Friday, May 18, 2012

ठहरी शबनम


रचना श्रीवास्त
1
खुली पलक
ठहरी  शबनम
मूँ
दी छलकीं
क्या तुम समझे  हो
इनकी मौन -भाषा
 ।
2
क्यों था जरूरी ?
यों शब्दों का तड़का
स्नेह
-नदी में
निर्बाध  बहती थी
थाम लेते बाहों में
 ।
3
उच्च  शिक्षा  थी
लोगों में  सम्मान था
स्वयं पे  मान l
नैनो  की  भाषा मौन
अनपढ़  जाने  न

4
जीवन -वृक्ष
नोचे तुमने पत्ते
बूचा खड़ा था
लिखा हर पत्ते पे
बस तेरा था नाम
 ।
5
स्याह जीवन
मुट्ठी में था सूरज
उडेला मैने
हो गया जो  उजाला
तो तुम भूले मुझे
 ।
6
तू  अनपढ़’-
कहके ठुकराया
पढ़ा था प्रेम 
मेरा प्रेम प
ढ़ना ही
 काफी न था शायद
 ।
7
‘’नहीं छोडूँगा
कभी भी साथ तेरा
साया हूँ तेरा
’’ 
बुरे दिन आये तो
वह  भी  छोड़ गया
 ।
8
भाग्य- चाशनी
बन न सकी पाग
पकाई बहुत
उसकी ही थी हाँड़ी
थी आ
च भी उसीकी
9
अपना सोचा
हो पाता   अगर तो
मै कवि होता
उसने दी कलम 
लेकिन भाव नहीं
 ।
10
भाव -नदी में
डुबोके ये कलम
लिखी कविता
उनको दिखे शब्द
भाव कहीं न मिला

11

सदा तुम थे
न मै थी,  न हम थे
कैसा ये साथ ?
गाड़ी के दो  पहिये
अलग न चलते
 ।
12
जीवन
-रथ
खेओं  जिस  भी दिशा
 सारथी तुम
भटके
यदि कभी
टूट जायेगा  घर
-0-

10 comments:

दीपिका रानी said...

बहुत सुंदर..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सभी तांका अद्भुत ... मन के भाव को स्पष्ट कहते हुये

ऋता शेखर मधु said...

क्यों था जरूरी ?
यों शब्दों का तड़का
स्नेह -नदी में
निर्बाध बहती थी
थाम लेते बाहों में ।

बहुत ही भावपूर्ण...
सभी ताँका बहुत अच्छे लगे...बहुत२ बधाई !!!

Anonymous said...

सभी ताँका बहुत खूबसूरत।
कृष्णा वर्मा

amita kaundal said...

चना जी एक एक शब्द अपनी पूरी बात कह रहा है इतने सुंदर तांका हैं की जिसे भी पढ़ती हो लगता है मेरे ही मन के भावों को आपने सुंदर शब्दों की लड़ियों मैं पिरो दिया हो.

क्यों था जरूरी ?
यों शब्दों का तड़का
स्नेह -नदी में
निर्बाध बहती थी
थाम लेते बाहों में ।
शब्दों का तड़का क्या सुंदर शब्दों का उपयोग किया है आपने, बधाई,

अमिता कौंडल

manukavya said...

वाह रचना ! कितने ख़ूबसूरत तांका हैं....

‘’नहीं छोडूँगा
कभी भी साथ तेरा
साया हूँ तेरा’’
बुरे दिन आये तो
वह भी छोड़ गया

बुरे वक़्त में कोई अपना नहीं...अँधेरा घिरते ही सबसे पहले साथ छोड़ता है साया... इस बात को कितनी खूबसूरती से बयान किया है..

अपना सोचा
हो पाता अगर तो
मै कवि होता
उसने दी कलम
लेकिन भाव नहीं

कलम तो कोई भी थाम सकता है... लेकिन भावोँ की नदी कहाँ से आये... अपने सोचने से कुछ नहीं होता... अपनी सोची कब होती है... जग जो चाहे सो होती है..

सदा तुम थे
न मै थी, न हम थे
कैसा ये साथ ?
गाड़ी के दो पहिये
अलग न चलते

पता नहीं कितने जीवन यूँ ही समन्वय के बिना साथ-साथ हो कर भी अकेले ही कट जाते हैं..
रचना आपको पढ़ना सदैव सुखद होता है...
सस्नेह
मंजु

डॉ. जेन्नी शबनम said...

सभी ताँका अनुपम. ठहरी शबनम पढ ठिठकी शबनम...

खुली पलक
ठहरी शबनम
मूँदी छलकीं
क्या तुम समझे हो
इनकी मौन -भाषा ।

मौन की भाषा जाने कौन समझे? भाग्य की बातें भाग्य ही समझे...

भाग्य- चाशनी
बन न सकी पाग
पकाई बहुत
उसकी ही थी हाँड़ी
थी आँच भी उसीकी ।

शुभकामनाएँ.

Rachana said...

aap sabhi ke sneh shabdon ka bahut bahut dhnyavad .
abhi bharat me hoon atah deri se utter de rahi hoon
aap sabhi ka punah dhnyavad
rachana

Dr.Bhawna said...

भाव -नदी में
डुबोके ये कलम
लिखी कविता
उनको दिखे शब्द
भाव कहीं न मिला ।

Bahut khub!

KAHI UNKAHI said...

सभी ताँका बहुत अच्छे लगे...बधाई...|