Sunday, April 29, 2012

आजादी नहीं


1-मंजु मिश्रा
1
कैसी  दुनिया  
जहाँ किसी को कोई 
आजादी नहीं
न बोलने की, न ही 
ख़ामोश रहने की
2
जब  बोलें तो 
क़हर टूटता है
चुप रहें
तो दिल टूटता है 
सजा हर हाल में ।
3
हाथ तो उठे 
कई बार, दुआ को
लेकिन हाथ 
लगा कुछ भी नहीं
सिवा  ढेरों दुःख के
4
मोमबत्ती -से 
जलते रहे हम 
जीवन  भर 
लेकिन अँधेरे थे
कभी छँटे ही नहीं
-0-

ओ मेरे कान्हा !

ज्योत्स्ना शर्मा
ओ मेरे कान्हा !
मुझको याद आया-
पीडा़ थी मेरी
तुमको क्यों रुलाया
चाहो तो तुम
यूँ मुझको सता लो
जैसे भी भाये
मुझे वैसे जला लो
इतना सुनो-
तुम हो प्राण मेरे
मुझमें बसे
'खुद ' को तो हटा लो
मुझसे कहो-
दर्द मेरे लिए थे
भला तुम क्यों सहो ...?
-0-
(चित्र: साभार गूगल)

Sunday, April 22, 2012

चंचल चाँद


डॉ  हरदीप कौर सन्धु
1
चंचल चाँद
खेले बादलों संग
आँख-मिचौली
मन्द-मन्द मुस्काए
बार-बार खो जाए
2
दूल्हा वसन्त
धरती ने पहना
फूल- गजरा
सज-धज निकली 
ज्यों दुल्हन की डोली 
3
ओस की बून्द
मखमली घास पे 
मोती बिखरे 
पलकों से  चुनले
कहीं  गिर  न जाएँ !
4
दुल्हन रात 
तारों कढ़ी चुनरी
ओढ़े यूँ बैठी 
मंद-मंद मुस्काए 
चाँद दूल्हा जो आए !
5
बिखरा सोना
धरती का आँचल
स्वर्णिम हुआ
धानी -सी चूनर में
सजे हैं हीरे- मोती
6
पतझड़ में
बिखरे सूखे पत्ते
चुर्चुर करें
ले ही आते सन्देश
बसंती पवन का
7
पतझड़ में
बिन पत्तों के पेड़
खड़े उदास
मगर यूँ न छोड़ें
वे  बहारों की आस
8
हुआ  प्रभात
सृष्टि ले अँगड़ाई
कली मुस्काई
प्रकृति छेड़े तान
करे प्रभु का गान
9
अम्बर छाईं
घनघोर घटाएँ
काले बादल
घिर-घिर घुमड़े
जमकर बरसे !
10
बादल छाए
चलीं तेज़ हवाएँ
बरसा पानी
भागी रे धूल रानी
यूँ घाघरा उठाए !
11
ओस की बूँदें
बैठ फूलों की गोद
लगता ऐसे
देखने वो निकलीं
छुपकर के रूप 
-0- 

कुछ मोती झरते


1- मुमताज टीएच खान
 1
मन को फाँ
तड़पाया जीवन
तीखी यादों ने
छटपटाए ऐसे
जल बिन मीन जैसे ।
2
मझधार में
फँसे जब भी नाव
न पतवार
न हो खेवनहार
प्रभु लगाए पार ।
-0-

2-संगीता स्वरूप 
1
घना सन्नाटा 
मौन की चादर  में 
दोनों लिपटे 
न तुम कुछ  बोले 
न मैं ही कुछ  बोली 
2
लब खुलते 
गिरह ढीली होती 
मन मिलते 
कुछ मोती झरते 
कुछ दंश हरते ।
3
गहन घन 
छँट जाते पल में ,
उजली रेखा 
भर देती  मन में 
अनुपम उल्लास ।
-0-

Thursday, April 19, 2012

तुम न सुन पाए


1-डॉ अमिता कौंडल
1
बिखरा मन
अंधकार है छाया
तुम जो रूठे
आस भी टूटी अब
गम भी गहराया ।
2
जो थाम लेते
तो न ये बिखरते,
प्यार के मोती
खुशियाँ भी बसतीं
आँगन भी खिलता ।
3
कब समझे
तुम प्यार की भाषा ?
बस मैं बोली,
तुम न सुन पाए
फिर जी भर रोई ।
-0-


Wednesday, April 18, 2012

यह जीवन


शशि पुरवार
1
यह जीवन 
कर्म से पहचान 
तन ना धन 
गुण से चार चाँद 
आत्मिक है मंथन ।
2
यह जीवन 
तुझ बिन है सूना 
हमसफ़र 
वचन सात फेरे 
जन्मो का है बंधन ।
3
यह जीवन 
कमजोर है दिल 
चंचल मन 
मृगतृष्णा चरम 
कुसंगति लोलुप ।
4
यह जीवन 
एक खुली किताब 
धूर्त्त इंसान 
बढ़ते पल-पल 
सच्चाई तार -तार ।
5
यह जीवन 
वक़्त पड़ता कम 
एकाकीपन 
जमा पूँजी है रिश्ते 
बिखरे छन - छन ।
6
यह जीवन 
आध्यात्मिक पहल 
परमानन्द 
भोगविलासिता से 
परे संतुष्ट मन ।
7
यह जीवन 
होता जब सफल 
पवित्र आत्मा 
न्योछावर तुझपे 
मेरे प्यारे वतन ।
8
यह जीवन 
नश्वर है शरीर
मन पावन
आत्मा तो है अमर 
मृत्यु शांत निश्छल ।
-0-

Tuesday, April 10, 2012

दो चोका


1-मिलना तेरा-मेरा
कमला निखुर्पा

धरती मिली
गगन से जब भी
पुलक उठी
क्षितिज हरषाया ।

बदली मिली
पहाडों के गले से
बरस गई
सावन लहराया

ओ मेरे मीत !
मिलना तेरा -मेरा
मिले हैं जैसे
नदिया का किनारा .
मन क्यों घबराया ?
-0-





2-मैं पाषाण
कमला निखुर्पा

मोम -सा प्यार
जल उठा पल में
पिघल गया
धुआँते रहे तुम ।

बह गई वो
प्रेम की निशानियाँ
तुम कोमल
       आहत जब हुए  ।
मैं तो पाषाण
जमीं युगों -युगों से
न बदली थी,
न बदलूँगी कभी  ।

वर्षों पहले
उकेरे थे तुमने
अंकित हैं वे
प्रेम -निशाँ मन में
साँसों मे जीवन में ।

Sunday, April 8, 2012

नदी में चाँद


नदी में चाँद ( ताँका )

डॉ अनीता कपूर
1
नदी में चाँद
तैरता था रहता
पी लिया घूँट
नदी का वही चाँद
 हथेली पे उतरा



2
शहर मेरा
मुरझा गया कुछ
चलो सींच दें
डाले इंसानियत
और प्यार की खाद ।
3
धुला चाँद- सा
आसमाँ का चेहरा
हँसा बादल
निखरा -निखरा -सा
बरसात के बाद ।
4
वो छूटे लम्हे
समेटे लिए मैंने
हो कर लीन
जिऊँ उन्हें दोबारा
जो हो  साथ तुम्हारा ।
5
दिलो- दिमाग
किया आत्म-मंथन
कशमकश
हुई प्रक्रिया पूरी
मिटी रिश्तों की दूरी ।
6
दौड़े शहर
रेलगाड़ी हो जैसे
लटके हम
जिंदगी को पकड़ें
जैसे गोद में बच्चा ।
7
मत उलझो
जीवन से अपने
सुलझा इसे,
डूबकर शून्य में
कहीं खो न हो जाओ ।

8
फिर बसंत
आया देने है फूल
झोली फैलाओ
धरती की चादर
सतरंगी बनाओ

9
देतीं ऋतुएँ
अपने बदन से
तोड़के फूल
हरे पत्तों की थाली
सजी छटा निराली ।
10
रिश्तों को पोतो
प्रेम के रंग ही से
ढह न जाये
दीवारें प्यार -भीगी
खाएँ नही चुगली ।
11
ज़िदगी रूई
मत बनाओ भारी
डुबाके इसे
दुखों वाले पानी में,
उड़ाओ आसमाँ में ।
12
रिश्ते पंछी -से
पकड़ो जो  सख्ती से
ये उड़ जाएँ,
सहलाओ प्यार से
तुम्हारे पास आएँ ।
13
कच्ची धूप से
खिले अजब रिश्ते
पकाओ धूप
औ’ प्रेम की आँच में
फिर चमकें  रिश्ते
-0-