Wednesday, February 22, 2012

स्पर्श जो मिला


1-डॉ हरदीप कौर सन्धु
आपका हाथ
छू गया मेरा माथ
स्पर्श जो मिला
ऐसा लगा मुझको
मन-कमल खिला।
2-रचना श्रीवास्तव
तुम  सूरज
हम छोटा -सा दिया
सो जाओ जब ,
हम जागेंगे तब
रौशन करें जग ।

गौरैया आती


3- ज्योतिर्मयी पन्त
1
गौरैया आती
चुगे दाना अँगना
दिखे न अब
कंक्रीट के जंगल
ढूँढे कहाँ ठिकाना ?

2
कटते वन
नीड़ खोजते  पाखी
हो बेसहारा
आती बाढ़ सुनामी
असहाय हों जन
3
हालात सदा
बुनें मकड़जाल
दिखें  सुन्दर 
जाने कहाँ फँसादें
प्रगति- रथ रोकें ।
 -0-

Saturday, February 18, 2012

बन्द और खुली किताब-2


4-ज्योतिर्मयी पन्त      
बन्द किताब
बन्द किताब
ज्ञान भरा सागर
दक्ष तैराक
गहन तल जाए
रत्न-मोती  पाए

बन्द किताब
छुपे पन्नों में स्मृति
शुष्क गुलाब
रेखांकित पंक्तियाँ
खुले उमड़ें ज्वार
बन्द किताब
संकोच भरा  मित्र
खुले अगर
पढूँ
 प्रत्येक  पन्ना 
सच्चा साथी  अपना

बन्द किताब
जैसे रूठी प्रेमिका
अन्दर क्या है?
जाने ,पर  बाँचे ना
शब्द मूक भावना

-0-
खुली किताब
खुली किताब
माँ -बाबा उपदेश
नित्य पठन
तब मन भाए ना
अब पछताए ना?
खुली किताब
तेरा -मेरा जीवन
अक्षर प्रेम
समझ ना पाए क्यों ?
अर्थ उलझे सदा

                      
-0- 

5-अमिता कौण्डल
1-बंद किताब
1
बंद किताब
ये  मन है  तुम्हारा
जो खोलो इसे,
तो पाओगे अनेकों
रंग और खुशियाँ
2
बंद किताब
रहे सदा ग़मों की
खुल जो गई
तो दु:खी जग होगा
और हम  मुज़रिम
3
बंद किताब
समेटे रहती है
ज्ञान ही ज्ञान
खुले तो यह बाँटे
खाली न हो फिर भी
4
बंद किताब
ढेरों सवाल लिये
जो खुल जाती
तो पाती जबाब  मैं
तुम्हारी खुशियों का
5
दिल न रखो
ये बंद किताब -सा
खोल दो इसे
पढ़ पाएँ हम भी
ये तड़प  तुम्हारी 
-0-
2-खुली किताब
1
खुली किताब
जीवन यह मेरा
पढ़ न  पाए
चाहकर भी तुम
बंद रखी हैं आँखें.
2
खुली किताब
यह प्रेम -सरिता
न बाँधों इसे
हकों  के बंधन  में
फर्जों की लड़ियों में
3
खुली किताब
जब मेरे जख्मों की
नक्श तेरा था
हरसूँ  पिया  तुझे
हर पल है जिया
-0-

Thursday, February 16, 2012

बन्द और खुली किताब

किताब चाहे बन्द हो या खुली, हमें बहुत कुछ कह जाती है । लेकिन हर एक के लिए ये अलग-अलग मायने रखती है ।
 कुछ दिन पहले मुमताज जी ने बन्द किताब को कुछ ऐसे पढ़ा ......
बन्द किताब -मुमताज (बरेली)
बन्द क़िताब
बरसों से यूँ पड़ी
खोलो न इसे
सिमट न पाएगी
भूली यादों की लड़ी
      *******
फिर रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी ने बन्द और खुली किताब को अपने ही अंदाज़ में पढ़कर हमें सुनाया .......
बन्द क़िताब -'हिमांशु'
1
बन्द क़िताब
कभी खोलो तो देखो
पाओगे तुम
नेह भरे झरने
सूरज की किरने ।
2
बन्द क़िताब
जब-जब भी खोली
पता ये चला-
पाया है बेहिसाब
चुकाया न कुछ भी ।
3
बन्द क़िताब
जो खुली अचानक
छलकी आँखें
हर पन्ना समेटे
सिर्फ़ तेरी कहानी ।
4
बन्द क़िताब
पन्ने जब पलटे-
शिकवे भरे
फ़िक्र रहा लापता
कोई जिये या मरे ।
5
बन्द क़िताब
बरसों बाद खुली
खुशबू उड़ी
हर शब्द से तेरी
मधुर छुअन की ।


6 .
बन्द किताब
कभी खोल जो पाते
पता चलता-
तुम रहे हमारे
जीवन से भी प्यारे

-0-
खुली किताब- हिमांशु
 1
खुली किताब
थी ज़िन्दगी तुम्हारी
बाँच न सके
आज बाँचा तो जाना
अनपढ़  थे हम ।
2
खुली किताब
झुकी तेरी पलकें
नैन कोर से
डब-डब करके
गर्म आँसू छलके ।
3
खुली किताब
ये बिखरी अलकें
आवारा घूमे
ज्यों दल बादल के
ज्यों खूशबू मलके ।
4
खुली किताब
तेरा चेहरा लगे
पन्ना-पन्ना मैं
जब पढ़ता जाऊँ
सिर्फ़ तुझको पाऊँ ।
5
खुली किताब
रहा दिल तुम्हारा
पढ़ न पाए
तो समझ न पाए
सदियों पछताए
6
खुली किताब
नज़र आया वही
लाल गुलाब
गले लग तुमने
दिया पहली बार ।
***********
सभी ये पढ़ रहें हो तो मेरा मन भी कुछ कहने को ललचाया । बन्द और खुली किताब मुझे कुछ यूँ बतियाती लगी ......
बन्द किताब ( हरदीप )
1 . 
बन्द किताब 
लगे जो बन्द पड़ी 
खोलता इसे 
बेचैन मन मेरा
रोज़ ख्यालों में पढ़ी 
2
बन्द किताब 
कोई राज़ छुपाए 
सारे जहाँ से 
राज़ में जो है छुपा
वह दिल में बसा 
3 .
बन्द किताब 
खोलने से डरता 
ये मन मेरा
अपने ही घर ने 
कैदी मुझे बनाया 
4 .
बन्द किताब 
बनी एक सवाल 
शिकायत भी 
कोई ढूँढ़ न पाया 
सही जवाब अभी 
5 .
बन्द किताब 
ज्यों ला -इलाज मर्ज़ 
जिन्दगी कर्ज़ 
यूँ ही बढ़ता गया 
ज्यों हमने की दवा !
खुली - किताब ( हरदीप )
1 .
खुली किताब 
शब्द बने आवाज़ 
इशारे कभी 
उस पल के जैसे 
जिन्दगी फूल बनी 
2 .
खुली किताब 
नए हैं अनुभव 
नए चेहरे 
बेख़ौफ़ है ज़िन्दगी 
जैसे बहे चिनाब 
3 .
खुली किताब 
समझ नहीं पाई 
क्यों ऐसे हुआ 
हँसता दिल मेरा 
आँखे भर क्यों रोया 
4.
खुली किताब 
तेरी यह जिन्दगी 
ढूँढ़ती रही 
सवालों के जवाब 
तूने किए ही नहीं 
5.
खुली किताब 
सुनहरी धूप- सी 
जिन्दगी मेरी
बिन दीवारों बना 
अपना आशियाना
--डॉ. हरदीप कौर सन्धु

Sunday, February 12, 2012

फूलों की कशीदाकारी -वसन्त

वसन्त के आगमन पर प्रकृति में नवसृजन का उत्सव प्रारम्भ हो उठता है । नई उमंग की एक लहर सी उमगने लगती है । आओ ऋतुराज वसन्त का प्रकृति के संग हम भी स्वागत करें !
रामेश्वर कम्बोज 'हिमांशु ' ; डॉ .हरदीप कौर सन्धु




                                                                                 डॉ . हरदीप सन्धु 
डॉ. हरदीप कौर सन्धु 

Monday, February 6, 2012

जीवन के प्रसंग


जीवन के प्रसंग
डॉ श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’
1
राजा बेटा है
माँ के लिए ठीक है
ये मत सोच
बड़ा  हो गया है तू
माँ पे राज करेगा।
2
सीखता है क्यों
बदलने के रंग
मौसम से तू
सीख सके तो सीख
जीवन के प्रसंग ।
3
रिश्ता क्या था वो
अजीब हलचल
रख दी जैसे
ये ज़िन्दगी बदल
साथ जो हर पल।
4
कुदरत का
ज़र्रा-ज़र्रा  सिखाए
ये समझाए-
मिलकर रहना
सब कुछ सहना ।
5
तेरा स्वभाव,
मौसम बदलना
एक नहीं है
मानव है ये जान
आगे बढ़ना काम
-0-


Wednesday, February 1, 2012

खिलेगी ये जिन्दगी


दिलबाग विर्क
 1
छाया: रोहित काम्बोज
  स्थायी नहीं है
  दुःख का पतझड़
   जब पड़ेंगी
    आशाओं की फुहारें
      खिलेगी ये जिन्दगी
      2
चलता रहे
  क्रम जीत हार का
 आशा रखना
दिल पर न लेना
कभी किसी हार को
      3
निराशा विष
आशा जीवनामृत
       दोनों विरोधी
       चुनाव है तुम्हारा
       चुन लेना जो चाहो