Tuesday, January 17, 2012

तेरी ख्वाहिश



डॉ0 हरदीप कौर सन्धु

हम दोनों तो 
नदी के किनारे दो 
जीवन भर
एक-संग तो  चले
मिल न सके
थी फिर भी मगर
उम्मीद  एक-
गिरे जो समन्दर
कभी ये नदी
मिट दोनों किनारे
एक हो  चलें
हम दोनों में कुछ
एक-सा लगे
मेरे दुःख जैसा ही
कभी  तू लगे
रौशनी सी- बिखरे
हँसती जो मैं
ये तू क्या जाने भला
रगों में मेरी
मेरा खून जो बहे 
ख्वाहिश तेरी 
ये दोनों किनारे तो
शायद मिलें
कभी ख्वाबों तक में!
प्यार की दोस्ती 
यहाँ रहेगी सदा
 हम मिलें न मिलें !
-0-

4 comments:

induravisinghj said...

प्यार की दोस्ती
यहाँ रहेगी सदा
हम मिलें न मिलें !
अदभुत संगम शब्दों का,सुंदर प्रस्तुति।

सीमा स्‍मृति said...

हँसती जो मैं
ये तू क्या जाने भला
रगों में मेरी
मेरा खून जो बहे
ख्वाहिश तेरी

क्‍या खूब भाव। प्‍यार की इंतहा यूं भी हुआ करती है। बधाई

Anonymous said...

हँसती जो मैं
ये तू क्या जाने भल
रगों में मेरी
मेरा खून जो बहे
ख्वाहिश तेरी
उत्कृष्ट भाव...बधाई।
कृष्णा वर्मा

डॉ. जेन्नी शबनम said...

bahut sundar ehsaas...

प्यार की दोस्ती यहाँ रहेगी सदा
हम मिलें न मिलें !

shubhkaamnaayen.