Tuesday, January 24, 2012

बचपन के दिन


प्रियंका गुप्ता

याद आते हैं
बचपन के दिन
खेलते हुए
लड़ना-झगड़ना
कुट्टी करना
फिर एक हो जाना
गुट्टी फोड़ना
गेंद-ताड़ी खेलते
गिर पड़ना
गिर के सँभलना
मिट्टी के टीले
चढ़ के फिसलना
फूलों पे बैठी
तितली पकड़ना
हरी घास पे
लोटपोट होकर
ओस की बूँदें
आँखों पर मलना
माँ का हाथ से
हर कौर खिलाना
दूर देश की
कहानियाँ सुनाना
रात घिरे तो
तारों की छाँव तले
आँचल ओढ़
माँ से लिपट सोना
वक़्त गुज़रा
हम बड़े हो गए
गुम हो गई
पुरानी निशानियाँ
वो शरारतें
नानी की कहानियाँ
मन चाहता
काश! कोई लौटा दे
वो बीता पल
छोटी-छोटी खुशियाँ
नन्हें सपने
मासूम बदमाशी
पर पता है-
फिर ऐसा न होगा
जो चला गया
लौट के नहीं आता
यादें सताती
अब यूँ ही जीना है
मीठी यादों के संग...।
-0-

2 comments:

त्रिवेणी said...

इस चोका पर सहृदय पाठकों की टिप्पणियाँ एक साथ दी जा रही हैं-

1-anju(anu) choudhary anuradhagugnani40@gmail.com an 24 (2 days ago)

वाह ....हर यादगार पल को कैद कर दिया अपनी लेखनी में
बहुत खूब
2-RITU
यादें अगर मीठी हों तो उनके सामने शक्कर भी फीकी है ..
अच्छी प्रस्तुति ..
3-डॉ. जेन्नी शबनम Jenny.Shabnam@gmail.com Jan 24
bahut khoobsurat choka. nahin bhoolte wo bachpan ke din... gudiyon...khelna... aah bahpan...waah bachpan...
4-रेखा jha.rekha20@gmail.com -Jan 24
वाह .....बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति
5-anju(anu) choudhary anuradhagugnani40@gmail.com Jan 24
वाह ....हर यादगार पल को कैद कर दिया अपनी लेखनी में
बहुत खूब

त्रिवेणी said...

आदरणीया डॉ क्रान्तिकुमार जी ने अपनी टिप्पणी मेल से भेजी थी , जो यहाँ दी जा रही है-आदरणीय सम्पादक द्वय
सादर नमस्कार!
चोका पढ़ा .मार्मिक और उत्कृष्ट भावों की सुंदर प्रस्तुति ह्रदय को छू लेती है .'कभी खाव्वों -------रहेगी सदा '
विपरीत हालात में रचनाकार की आशावादिता काबिलेतारीफ है .सटीक शब्द चयन और सरल अभिव्यति
हेतु बधाई . कृपया रचनाकार तक मेरी भावना प्रषित करें .
भाभी जी से नमस्कार.
क्रांति
२४ जनवरी २०१२.