Tuesday, December 27, 2011

मन -सागर


ज्योतिर्मयी  पन्त
1
माटी का दीया
रुई की बनी बाती
तिल का तेल
एकता  का कमाल
घर भर   उजाला
2
मन -सागर
उर्मिल भावनाएँ
अश्रु -नदियाँ
बहें, होते  न रिक्त
मोती अपनत्व के।  
3
कैसी उदासी
साहस की  मशाल
सूरज- चाँद
हर कोई न यहाँ
तारा बन चमको।
4
छोटे सितारे
झिलमिला कहते-
बाँटे रहस्य
सुझा दें भूली राहें
सामर्थ्य भर ओज ।
5
जीवन- गाड़ी
विश्वास -प्रेम -चक्र
धैर्य पथ पे
चले संगी नेह ले
हटें गतिरोध भी।
6
माँ  का  दुलार
शब्दों से परे गीत
अतुलनीय
परछाई-सा मीत
पिता घर की नींव।
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2 comments:

Rachana said...

माँ का दुलार
शब्दों से परे गीत
अतुलनीय
परछाई-सा मीत
पिता घर की नींव।
pita ghr ki niv hota hai sahi kaha hai .pita ki seva samarpan jaldi koi likhta nhai
rachana

Anonymous said...

माँ का दुलार
शब्दों से परे गीत
अतुलनीय
परछाई-सा मीत
पिता घर की नींव।
बहुत खूब कहा।