Friday, December 23, 2011

नदिया बहे


डॉoरमाकान्त श्रीवास्तव
1
नदिया बहे
रुके न पल भर
कहाँ लक्ष्य है ?
ऐसे ही चलना है
हमको बढ़ना है
2
व्यथा घोलता
किसे है पुकारता
ये पपीहरा
रो रहा वनान्त है
दुःख ये नितान्त है
3
बड़भागी है
मानव का जीवन
पुण्यों का फल
सतत यह चले
कर्त्तव्य कर भले ।
4
दिन ढलता
वैसा ही है जीवन
झुकती साँझ
यदि निशा आएगी
तो चाँदनी छाएगी
5
लूटतन्त्र है
स्वार्थसिक्त राज है
क्रूर ताज है
देश कहाँ जा रहा
भोर क्यों न आ रहा ।
6
अरी लतिके !
क्यों लिपटती जाती
प्रेमी तरु से
सौत आँधी आएगी
क्रूरता दिखाएगी
-0-

3 comments:

ऋता शेखर 'मधु' said...

बड़भागी है
मानव का जीवन
पुण्यों का फल
सतत यह चले
कर्त्तव्य कर भले ।

सारे ही ताँका बहुत अच्छे लगे...आभार!

Dr.Bhawna said...

अरी लतिके !
क्यों लिपटती जाती
प्रेमी तरु से
सौत आँधी आएगी
क्रूरता दिखाएगी
javab nahi bahut sundar !

ज्योति-कलश said...

सुन्दर भावों से परिपूर्ण ताँका ...

दिन ढलता
वैसा ही है जीवन
झुकती साँझ
यदि निशा आएगी
तो चाँदनी छाएगी...बहुत सुन्दर ...हार्दिक बधाई ...सादर नमन !!