Friday, December 16, 2011

बोई मुस्कानें


डॉ0उर्मिला अग्रवाल
1
बोई मुस्कानें
सींचा अश्रु-जल से
फल ये मिला
अश्रु नहाई हँसी
सागर -सी ज़िन्दगी
2
खिली धूप-सी
स्मृतियाँ अतीत की
पैर पसारें
मन के आँगन में
ऊष्मा से भर जाएँ
3
ढूँढ़ते  रहे
क़दमों के निशान
अपनी राह
ख़ुद न बना सके
बेड़ी-जकड़े पाँव
3
मान ने किया
उस पर विश्वास
यही कुसूर
अपना हुआ और
वो  दग़ा कर गया
4
देखते रहे
तुझको रोते हुए
कोशिश तो की
पर चाह के भी न
पी सके तेरे आँसू
5
बहाती आती
मुस्कान की मदिरा
शुभ्र चाँदनी
और चाँद पी रहा
चषक भर-भर
6
जीवन-तरी
तेरे मन के घाट
जा रुकी और
अब लौटती नहीं
बोलो तो  मैं क्या करूँ ?
7
मेरी मुनिया
कैसे बदल डालूँ
तेरी क़िस्मत
भुगत रही तू भी
नारी होने की सज़ा
8
ऐ मेरे दोस्त
कुछ मुश्किल नहीं
प्यार करना
मुश्किल तो होता है
अलविदा कहना
9
तुम्हारी यादें
औ ज़िन्दगी की राहें
हमेशा ही तो
साथ- साथ चलतीं
कैसा बहनापा है !
10
एक न मिले
तो दूसरी मंजिल
तलाश लेना
अच्छा नहीं है राही
थक के बैठ जाना
-0-

2 comments:

Rama said...

खिली धूप-सी
स्मृतियाँ अतीत की
पैर पसारें
मन के आँगन में
ऊष्मा से भर जाएँ


बहाती आती
मुस्कान की मदिरा
शुभ्र चाँदनी
और चाँद पी रहा
चषक भर-भर
भावपूर्ण तांका हैं.पर ये मन को छू गए .....बहुत-बहुत बधाई ...
डा. रमा द्विवेदी

amita kaundal said...

मान ने किया
उस पर विश्वास
यही कुसूर
अपना हुआ और
वो दग़ा कर गया

देखते रहे
तुझको रोते हुए
कोशिश तो की
पर चाह के भी न
पी सके तेरे आँसू
मेरी मुनिया
कैसे बदल डालूँ
तेरी क़िस्मत
भुगत रही तू भी
नारी होने की सज़ा

bahut sunder tanka hain badhai.........