Tuesday, December 6, 2011

जीवन-ओस


-रचना श्रीवास्तव
 जीवन ओस
पीना ही पड़ता है
जीना पड़ता
मन चाहे   न चाहे
जीवन-सूर्य
जलाता हरदम
झुलसे तन
पर  प्यारा सबको
जीवन -राग
सुर या बेसुर में
गाएँ सब ही
सुख में या दुःख में
जीवन- ऋतु
दिन बसन्ती  कम
पत्ते झरे है
प्रत्येक मौसम में
जीवन -रेत
मुट्ठी से फिसलता
भीची जोर से
सिरान आया हाथ 
अचम्भित मै
समझ न पाई हूँ
इसके खेल
जीवन है शीतल
या लहू  की चुभन
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4 comments:

Dr.Bhawna said...

झुलसे तन
पर प्यारा सबको
जीवन -राग
सुर या बेसुर में
गाएँ सब ही...
Bahut sateek baat jiivan sabko hi bahut pyaara hota hai chahe kase bhi jiyen...

डॉ. जेन्नी शबनम said...

sach mein bahut mushkil hai samajhna ki jivan kya hai, behad bhaavpurn abhivyakti, badhai.

amita kaundal said...

जीवन ओस
पीना ही पड़ता है
जीना पड़ता
मन चाहे न चाहे
kya khoob likha hai rachna ji. badhai.........

ऋता शेखर 'मधु' said...

समझ न पाई हूँ
इसके खेल
जीवन है शीतल
या लहू की चुभन

बहुत अच्छा लिखा है...