Tuesday, December 27, 2011

चाँद जो आया


डॉ 0 सुधा गुप्ता
1
चाँद जो आया
धूमिल हुए तारे
सारे बेचारे
कोई न पूछे बात
सब चाँद निहारे ।
2
पूनो की रात
शामियाना तना है
दूध-उजला
हरी-हरी जाजम
धरती ने बिछा दी ।
3
धन्य गुलाब
रंग और खुशबू
दोनों हैं पास
जीने न देते काँटे
यही सोच उदास ।
4
भोर को देख
बुझता दीया कँपा
नींद आती है
करवट बदल
सो गया वो अचल ।
5
फूटे हैं छाले
रिस रहे हैं ज़ख़्म
रोती धरती
कोई मुझे बचाए
मरहम लगाए ।
6
कोकिल लाया
वसन्त का सन्देसा
झूमी बगिया
हवा नाचती फिरे
भँवरे गुंजारते
7
भोर वेला में
दुखा दिया हियरा
पूछे पपीहा:
कहाँ गए रे पिया
सदा भटके जिया ।
8
शैशव मधु
तरुणाई तिलिस्म
ठूँठ बुढ़ापा
काठ व पत्थर का
नीरस -सा पुतला
9
सावन-भादों
जैसे बरसे नैन
माँ है अधीर
बेटा बसा बिदेस
साथ ले गया चैन
10
होठों पे ताले
सिसकती दीवारें
सन्देश बिन
करवटें लेती रातें
जाले -लटके दिन ।
-0-

मन -सागर


ज्योतिर्मयी  पन्त
1
माटी का दीया
रुई की बनी बाती
तिल का तेल
एकता  का कमाल
घर भर   उजाला
2
मन -सागर
उर्मिल भावनाएँ
अश्रु -नदियाँ
बहें, होते  न रिक्त
मोती अपनत्व के।  
3
कैसी उदासी
साहस की  मशाल
सूरज- चाँद
हर कोई न यहाँ
तारा बन चमको।
4
छोटे सितारे
झिलमिला कहते-
बाँटे रहस्य
सुझा दें भूली राहें
सामर्थ्य भर ओज ।
5
जीवन- गाड़ी
विश्वास -प्रेम -चक्र
धैर्य पथ पे
चले संगी नेह ले
हटें गतिरोध भी।
6
माँ  का  दुलार
शब्दों से परे गीत
अतुलनीय
परछाई-सा मीत
पिता घर की नींव।
  -0-

Friday, December 23, 2011

भावों की वर्षा


रचना श्रीवास्तव
1
भावों की वर्षा
बंजर जज़्बात में
सूख जाती है
उगती  नागफनी
हिना लगे हाथों में
2
लोभ -अग्नि में
आहुति दी उसकी
कब तक दे
स्त्री  होने का 'कर '
कभी तो अन्त कर
3
प्रभु बताओ
क्या स्त्री  होना ज़ुर्म है ?
  जन्म देना
अग्निपथ जाने को
वेदना  सहने को
4
शब्दों का लावा
आत्मा पर फफोले
घायल मन
पर उफ़ न करे
तो महान है नारी !
5
शब्दों का शोर
देखता नहीं कोई
रिश्वत चश्मा
चढ़ा है आँखों पर
उतारे ,तब दिखे

6
भीगे थे शब्द
ठिठुरते हुए  वो
किताबों छुपे
वेदना समझी न
उन भोले शब्दों की 
7
सहती रही
बाँझ होने का ताना
धरा -सुन्दरी
हुई ईश्वर -कृपा
तो अंकुरित हुई
8
भटके शब्द 
मिला किनारा उन्हें
 
आपने
थामा
मथा भावनाओं को
 
काव्य  के मोती मिले
9
गली  में आई
 
उजाले  की किरण
 
शब्दों  को धोया
 
बही काव्य की धारा ,
कविता महक उठी
10
मन की पीड़ा
अँधेरे में सिसकी
सुनाई न दी
दूसरों की पीड़ा से
दु:खी  होता है कौन
 -0-

नदिया बहे


डॉoरमाकान्त श्रीवास्तव
1
नदिया बहे
रुके न पल भर
कहाँ लक्ष्य है ?
ऐसे ही चलना है
हमको बढ़ना है
2
व्यथा घोलता
किसे है पुकारता
ये पपीहरा
रो रहा वनान्त है
दुःख ये नितान्त है
3
बड़भागी है
मानव का जीवन
पुण्यों का फल
सतत यह चले
कर्त्तव्य कर भले ।
4
दिन ढलता
वैसा ही है जीवन
झुकती साँझ
यदि निशा आएगी
तो चाँदनी छाएगी
5
लूटतन्त्र है
स्वार्थसिक्त राज है
क्रूर ताज है
देश कहाँ जा रहा
भोर क्यों न आ रहा ।
6
अरी लतिके !
क्यों लिपटती जाती
प्रेमी तरु से
सौत आँधी आएगी
क्रूरता दिखाएगी
-0-

Sunday, December 18, 2011

हवा गाती है


सुदर्शन रत्नाकर
1.
पत्तियों पर
मोती-सी ओस बूँदें
मोहती मन
सूरज सोख लेता
पर उसका तन
2.
कमल खिले
भँवरे मँडराए
मिला पराग
सुध-बुध ही खोई
बचता कोई-कोई
3.
पर्वत पर
बादल मँडराते
दिल हों जैसे
आशाओं के दीपक
जलते हैं रहते
4.
हवा गाती है
पत्तियाँ नाचती हैं
फूल फैलाते
माहौल में खुशबू
मन को महकाते
5.
एक चिड़िया
उड़ती आकाश में
गीत सुनाती
छूती है ऊँचाईयाँ
इधर-उधर से
6.
शीतल छाया
पीपल के पेड़ की
खो गई कहीं
सपना लगती है
बड़ी याद आती है
7.
माँ की ममता
पिता को वो दुलार
कहाँ खो गए
अपनों की भीड़ में
क्यों अकेले हो गए
8.
सुबह होती
चिड़िया चहकती
मन मोहती
वातावरण देखो
प्रकृति सँभालती
9.
मैं सोती रही
दुनिया जगती थी
क्या पछताना
जहाँ आँख खुलेगी
होगा वहीं उजाला
10
कर्म विहीन
कागज़ के फूल-सा
व्यर्थ जीवन
कब तक कटेगा
ऐसा सुगंधहीन
-0-

भौंरों ने ली हिचकी


रेखा रोहतगी
1
उपवन में
होते हैं फूल काँटे
सोचो मन में   
सुख औ दु:ख होते   
वैसे जीवन में।
2
मुझे बचाया   
गिरने से उसने  
जो था पराया   
आँधियों का शुक्रिया   
अपनो को दिखाया ।
3
दूर हो तुम  
तो मेरे मन से भी   
हो जाओ गुम  
तो मैं चैन से जिऊँ   
चैन से मरूँ ।
4
न हुए फेरे
न थे बाहों के घेरे  
तुम ना आए  
नयन भरे नीर   
है अनब्याही पीर ।
5
तन -पिंजरा   
पंछी क्या गीत गाए  
आज़ाद हो तो  
साथियों से जा मिले   
और चहचहाए ।
 6
सींचा जड़ को 
खिल उठी कलियाँ  
पत्तियाँ हँसी  
भौंरों ने ली हिचकी  
शाख़ -शाख़ लचकी ।
7
पीली चूनर  
ओढ़ इठलाए  
छोरी प्रकृति  
फूलों का है झूमर  
हरी-हरी घाघर ।
8
धूप सेंकती   
सर्दी में  ठिठुरती   
दुपहरियाँ  
आँगन में बैठी हों   
ज्यों कुछ लड़कियाँ।
9
चन्दा मछरी
गगन-सागर में  
तैरती जाए  
सूरज मछेरे को  
देखे तो छुप जाए।
10
पलाश खड़े   
लाल छाता लगाए  
गर्मी में जब   
जलते सूरज ने   
अंगारे बरसाए।

Friday, December 16, 2011

खुशी का पता


डॉoसतीशराज पुष्करणा
1
नदी न पीती
कभी अपना पानी
त्याग सिखाती
आगे बढ़ जाती है
समर्पित होने को ।
2
लोभ में फँसे
इस जग के लोग
सच न जानें
झूठ को अपनाएँ
बहुत पछताएँ ।
3
आत्मा का रिश्ता
सिर्फ़ परमात्मा से
शेष है माया
जिसके चक्कर में
ये जग भरमाया।
4
चिन्ता न मुझे
जीवित मेरी माँ है
फ़िक्र क्यों करूँ
कवच आशीर्वाद का
जब  है मेरे साथ ।
5
मानो न मानो
माँ कभी न मरती
ज़िन्दा रहती
एहसास के साथ
सदैव पास-पास ।
6
ठोकर लगी
गिरने से पहले
जिन्होंने थामा
और कुछ नहीं था
थे हाथ मेरी माँ के
7
स्वप्न में आई
आशीर्वाद दे गई
मुझे मेरी माँ
उठकर जो देखा
सुख के फूल खिले ।
8
रात में खिला
चाँद आसमान में
तेरा चेहरा
हँसते गुलाब -सा
नज़र आया मुझे
9
खुशी का पता
क्या उसको चलता
झेला ही नहीं
जिसने ग़म कभी
नश्वर जीवन में ।
10
दोस्ती में यारो
मारे गए हम तो
वरना क्या थी
मज़ाल ज़माने की
जो छू लेता हमको ।
-0-