Sunday, November 20, 2011

भटके तीर्थ सारे


राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी 'बन्धु'
1
स्वार्थ के लिए
पेड़ों को काट डाला
जैसे दुश्मन
दूषित हुई हवा
बीमार हुए हम
2
खिला कमल
कीचड़ में रहके
सौन्दर्य पाया
संघर्ष द्वारा आप
खुद को सँवारिए
3
मन्दिर खोजे
भटके तीर्थ सारे
प्रभु तो नहीं
महन्त मिले सब
माया की चाह लिये
4
रात में तारे
जड़े काली साड़ी में
श्वेत सितारे
चन्दा लगे हर्षित
जैसे होगी सगाई
5
आम बौराए
पीली सरसों देख
भौंरा मुस्काए
धरा ने ओढ़ लिया
स्वर्णिम पीत पट
6
कैसा ज़माना !
बिखर गया घर
बेटा विदेशी
बूढ़े माँ -बाप जिएँ
उम्मीद के सहारे।
7
बाढ़ जो आई
मिटा दिए निशान
कभी गाँव थे
बन गए भिखारी
थे कभी धनवान
-0-

No comments: