Tuesday, October 4, 2011

वो रूठा ऐसे


 डॉ. हरदीप कौर सन्धु
1. 
हुआ सवेरा 
लो उड़ गए पाखी 
मार उड़ारी
दूर ऊँचे गगन 
पहले ही मुझसे !


2.
चाँद - चाँदनी
करे मुझसे बातें 
मेरी तन्हाई 
खामोश अँधेरे में 
छुप-छुप आँचल !


3. 
दिल चाहता 
रहे करीब कोई 
मैं रूठ जाऊँ
जग रूठा ज्यों लगे 
वो मुझको मनाए !

4 .

वो रूठा ऐसे 
मैं रही मनाती 
वो नहीं माना
सपनों में बताऊँ 
उसे मन की बातें !


5 .
मन त्रिंजण
काते प्यार किसीका 
वो नहीं जाने 
दिल चीर दिखाया 
बिखरा रेशे -रेशे !

***************

13 comments:

Dr.Bhawna said...

वो रूठा ऐसे
मैं रही मनाती
वि नहीं माना
सपनों में बताऊँ
उसे मन की बातें !...
javab nahi is soch ka bahut 2 badhai..

Anonymous said...

दिल चाहता
रहे करीब कोई
मैं रूठ जाऊँ
जग रूठा ज्यों लगे
वो मुझको मनाए !


वो रूठा ऐसे
मैं रही मनाती
वो नहीं माना
सपनों में बताऊँ
उसे मन की बातें !

हरदीप जी ,
बहुत भावपूर्ण तांका लिखे है आपने .....बधाई एवं विजय दशमी की हार्दिक मंगलकामनाएं ....

डा.रमा द्विवेदी

KAHI UNKAHI said...

चाँद - चाँदनी
करे मुझसे बातें
मेरी तन्हाई
खामोश अँधेरे में
छुप-छुप आँचल !

बहुत भावपूर्ण तांका है...बधाई...।

सुनील गज्जाणी said...

नमस्कार !
बेहद सुंदर '' तांका '' विधा में रचित आप कि रचनाये ,बधाई
सादर

युग-चेतना said...

मन त्रिंजण
काते प्यार किसीका
वो नहीं जाने
दिल चीर दिखाया
बिखरा रेशे -रेशे !

नूतन बिम्ब, अभिनव प्रयोग में रची बसी रचना के लिए हार्दिक बधाई ...

हिन्दी हाइगा said...

sabhi taanka bhut bhavpurn hain...badhai

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर भावपूर्ण रचनाएं....
टांका पढने और इसके बारे में जानना सुखद है...
सादर आभार....

udaya veer singh said...

मन त्रिंजन का रोग पालो ,बिन पाए खो जाना है ......
अछे साक्ष्य बधाईयाँ जी /

अमिता कौंडल said...

वो रूठा ऐसे
मैं रही मनाती
वि नहीं माना
सपनों में बताऊँ
उसे मन की बातें
बहुत सुंदर तांका हैं बधाई हरदीप जी
सादर
अमिता कौंडल

डॉ. जेन्नी शबनम said...

behad bhaavpurn taankaa...
मन त्रिंजण
काते प्यार किसीका
वो नहीं जाने
दिल चीर दिखाया
बिखरा रेशे -रेशे !

shubhkaamnaayen.

Babli said...

सभी ताँका बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!

Anonymous said...

मुझे सभी ताँके बहुत अच्छे लगे. डॉ. हरदीप कौर सन्धु जी को बहुत बहुत बधायी.

उमेश मोहन धवन

13/134, परमट कानपुर

Anupama Tripathi said...

बहुत सुंदर और भाव पूर्ण रचना ....