Monday, April 1, 2019

659


ज्योत्स्ना प्रदीप
1
तेरी चाहत प्यारी
दे दी रे तुझको
उजली आभा सारी ।
2
घेरे तेरा साया
जीवन अँधियारा
रौशन तुझको पाया ।
3
ये साथ हमेशा रे
तेरा नाम जपे
तन का हर रेशा रे ।
4
तू  खुद  उजला राही
तुझसे रौशन है
नभ की नीली स्याही ।
5
ये प्रेम अनोखा है
दिल का भँवर कहे
अंतर्मन सोखा है ।
-0-

Wednesday, March 27, 2019

658


जीवन मेरा 
डॉ.जेन्नी शबनम

मेरे हिस्से में
ये कैसा सफ़र है
रात और दिन
चलना जीवन है,
थक जो गए
कहीं ठौर न मिला
चलते रहे
बस चलते रहे,
कहीं न छाँव
कहीं मिला न ठाँव
बढते रहे
झुलसे मेरे पाँव,
चुभा जो काँटा
पीर सह न पाए
मन में रोए
सामने मुस्कुराए,
किसे पुकारें
मन है घबराए
अपना नहीं
सर पे साया नहीं,
सुख व दु:ख
आँखमिचौली खेले
रोके न रुके
तंज हमपे कसे,
अपना सगा
हमें छला हमेशा
हमारी पीड़ा
उसे लगे तमाशा,
कोई पराया
जब बना अपना
पीड़ा सुन के
संग संग वो चला,
किसी का साथ
जब सुकून देता
पाँव खींचने
जमाना है दौड़ता,
हमसफर
काश ! कोई होता
राह आसान
सफर पूरा होता,
शाप है हमें
कहीं न पहुँचना
अनवरत
चलते ही रहना।
यही जीवन मेरा।
-0-

Sunday, March 17, 2019

657


रमेश कुमार सोनी
1
रोने–हँसाने
जब कोई ना आता
आती है यादें
जनाज़े तक जाती
सुख–दुःख सहेली
2
पत्थर सहे
तराशने का दर्द
मूर्ति हो गया
पीड़ा सुनता रहा
पुनः पत्थर हुआ
3
ख़ुशी गुम थी
मिलता रहा गम
मेलों में  ढूँढा
युगों बीत गए हैं
मैं खुद खोने लगा
4
रोने की अदा
खुश्क रहा दामन
एक फ़साना
दिल में रक्त अश्रु
दिखे तो कैसे दिखे ?
5
युगों से प्यासा
समुद्र बन दौड़ा
अश्रु का घोड़ा
कंठ सूखता गया
प्यार बढ़ता गया
6
श्मशान हुए
ख्वाबों की लाश पाले
भूत-सा फिरा
वो फूल चढ़ा ग
मोक्ष दिया , शुक्रिया ।
7
मिट्टी का जिस्म
दुखों के मेघ दौड़े
शान से बिछे
प्यार के दूब हँसे
बगीचे खिल उठे ।
 8
घटे दायरे
अकेलों की दुनिया
वीरानी डसे
यहाँ–वहाँ भटका
ख़ामोशी लिए लौटा
9
आँधी रो है
रातें हाथ मलतीं 
लहू का दिया
बुझा न पा कभी
दिल जला रखा था
10
रिश्तों की जीभ
मरणासन्न पिता
चुए–टपके
वसीयत हो रही
मरे तो माल बाँटें

..........-0-
रमेश कुमार सोनी
जे.पी. रोड – बसना जिला – महासमुंद , छत्तीसगढ़ , 493554
Mob. – 7049355476 / 9424220209

Saturday, February 23, 2019

656


1-तुम सागर हो मेरे
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'
1
तुम चन्दा अम्बर के
मैं केवल तारा
चाहूँगा जी भरके।
2
तुम केवल मेरे हो
साँसों में खुशबू
बनकरके घेरे हो।
3
जग दुश्मन है माना
रिश्ता यह दिल का
जब तक साँस  निभाना।
4
तुझको उजियार मिले
बदले में मुझको
चाहे अँधियार मिले।
5
तुम सागर हो मेरे
बूँद  तुम्हारी हूँ
तुझसे ही लूँ फेरे।
-0-
2-ताँका

कृष्णा वर्मा
1
भाई से भाई
ना रिश्ता कोई स्थायी
नफ़रत की
माचिस लिये हाथ
स्वयं लगाई आग।
2
मिटे संस्कार
मरा आपसी प्यार
निज आँगन
करके तक़सीम
करें द्वेष व्यापार।
3
कहते हवा
बदली ज़माने की
किसके माथे
मढ़ेगा कोई दोष
बैठे सब ख़ामोश।
4
आपा-धापी में
हड़बड़ाई फिरें
ज़िंदगानियाँ
भूले हैं अपनापा
मन में दु:ख व्यापा।
5
वक़्त निकाल
कर लो स्वजनों से
दो मीठी बात
रहेगा मलाल जो
टँग गए दीवाल।
6
जंगल -बस्ती
घेरे हैं उलझनें
बाँटो दिलासा
मर न जाए कोई
कहीं यूँ बेबसी से।
7
शाह नवाब
तख़्त रहे न ताज
दंभ क्यों सींचे
आज माटी ऊपर
औ कल होंगे नीचे।
8
रखा संदेह
रूठे रहे हमसे
रूह छूटेगी
न उठाकर
रो-रो करोगे बातें।
9
रिश्ते में मोच
मलाल की खोह में
जा बैठे सोच
अमावसी रातें हों
उदासियों के डेरे।
10
रहनुमाई
सौंपी जिन्हें हमने
जले हैं घर
उन्हीं की साजिशों से
कैसे थे मनसूबे।
-0-

Sunday, February 10, 2019

655



1- मन-दर्पण
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

मन-दर्पण
धूल इतनी जमी
अपनी कमी
नज़र नहीं आई
उम्र गवाँई
जीभर औरों पर
धूल उड़ाई
रिश्तों की पावनता
की तार- तार
कभी लाज न आई।
प्यार है पाप
उदारता सन्ताप
चिल्लाते रहे
मन की कालिमा को
तर्क -शर से
सही बताते रहे।
आदि से अन्त
यही था सिलसिला
मन आहत
तन  हुआ खंडित
कुछ न मिला
रहे ख़ाली ही हाथ
घुटन घनी
किस लोक जाएँ कि
घाव दिखाएँ
सत्य हुआ था व्यर्थ
झूठ गर्व से भरा।
-0-

Tuesday, February 5, 2019

654


1-सुदर्शन रत्नाकर
1
तुम बात बनाते हो
वादा करके भी
पास नहीं आते हो।
2
ऐसा क्यों कहती हो
मुझसे दूर नहीं
इस दिल में रहती हो।
3
शीतल यह छाया है
सुख खोकर ही तो
मैंने कुछ पाया है।
4
लम्बी ये रातें हैं
आओ बैठ करें
दिल में जो बातें हैं।
5
छत पर कागा बोला
ठंडी पवन चली
मन मेरा भी डोला।
6
बेघर जो होते हैं
सरदी में भी, वो
पटरी पर सोते हैं।
-0-सुदर्शन रत्नाकर,ई-29, नेहरू ग्राउण्ड,फ़रीदाबाद 121001
-0-
2-मंजूषा मन
1
पीले पत्ते टूटे
लती बेला में
रिश्ते सारे छूटे।
2
तुम को ना छोड़ेंगे
जन्मों का नाता
कैसे हम तोड़ेंगे।
3
नातों की बात न कर
कौन निभाता है
नातों को जीवन भर।

4
जीवन भर साथ रहो
भोले इस मन से
क्यों रूठे आप कहो।
5
रूठे हम तुम से कब 
खेल गई किस्मत
हम बिछड़े तुम से ब।
6
बिछड़े भी हैं मिलते
मन में चाहत हो
दिल फूलों से खिलते।
7
फूलों की बात न कर
संग चलो जो तुम
हम चल लें काँटो पर।
-0-

Monday, January 28, 2019

853-वक़्त


डॉ जेन्नी शबनम

वक्त की गति 
करती निर्धारित  
मन की दशा 
हो मन प्रफुल्लित 
वक़्त भागता
सूर्य की किरणों-सा
मनमौजी-सा
पकड़ में न आता
मन में पीर
अगर बस जाए
बीतता नहीं
वक़्त थम-सा जाता
जैसे जमा हो
हिमालय पे हिम
कठोरता से
पिघलना न चाहे,
वक़्त सजाता
तोहफ़ों से ज़िन्दगी
निर्ममता से
कभी देता है सज़ा
बिना कुसूर
वक़्त है बलवान
उसकी मर्ज़ी
जिधर ले के चले
जाना ही होता
बिना किए सवाल
बिना दिए जवाब!
-0-