Monday, December 11, 2017

785

ताँका रचनाएं : डा. सुरेन्द्र वर्मा

1

घिरती रात 

दहाड़ती लहरें

समुद्र तट -

यहाँ नहीं हो तुम

फिर भी मेरे पास

2

हर चौखट

भटकता रहा मैं

तुम्हारे लिए

जंगल में बस्ती में

गरमी में सर्दी में

3

इतना वृद्ध

कि छोड़ गए मित्र

सारे के सारे

बरगद पुराना

देता रहा सांत्वना

4

वासंती दिन

हर जगह शान्ति

जूही के फूल

क्यों अशांत होकर

यत्र तत्र बिखरे 

5

वादा करके

मुकर गई थी

मेरी तो छोडो

सौगंध खाकर वो

है कित्ती दयनीय !

 6  

एक अकेला

पर्वत की ढाल पे

चीड का वृक्ष

चारो ओर ताकता

कोई साथी न पास

7

युग युगांत

बीते राह देखते

झोली न भरी

खाली आई थी साथ

रीती चली जाएगी

8

डूबना चाहा

उतराता ही रहा

सतह पर

गहरी थी नदिया

तैर भी तो न पाया

9

सर्वत्र व्याप्त

अनुपस्थित रहा.

एकला चला 

भीड़ जुटती गई

राह बनती गई

(10

गुलमोहर

सहता रहा ताप

हंसता रहा

तंज कसता रहा

क्रोध पर सूर्य के

-0-                                               

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड ,इलाहाबाद -२११००१ 

-0-
2-पुष्प मेहरा 

यादें हैं मेरी
उधार की न कोई,
मिलीं भेंट में
अपनों से ही मुझे
अमूल्य बड़ी
ब्याज़ न वसूलतीं
लुटीं न कभी
मन- पेटिका भरी
चमकती हैं
सदा स्वर्ण-आभा- सी
दिपदिपातीं
रातों में जुगनू -सी
चन्द्र-चन्द्रिका
भोर उजास -भरी
झोंका हवा का
ठंडा मनभावना
जुड़ाता मन
ताप धूप का बन
जलाती मन
कभी झड़ी वर्षा की
फुहार बन
अंतर्मन भिगोती,
अरे ! देखो तो
पेटी में बंद  डाँट
प्यारी अम्मा की
जो तहों में सहेजी
पड़ी थी दबी
आज अचानक ही
खुलने लगी
परतें,सुगंधित
उसकी सारी ,
भीगा जो मन-पट  
मीठी गंध से
हो उठी भावुक मैं
रोए जो नैन
तह से खुला पल्लू ,
माँ का निकला        
पोछने लगा आँसू
धीरे-धीरे से,
अहा !अमोल पल
सुरभित वे
भूलूँगी नहीं कभी
सोचती हुई ,
दौड़ गई तेज़ी से
कभी बस्ती में
कभी सूनेपन में
झूलों-पेड़ों पे
मन्दिरों व बागों में
खलिहानों में
रातों-महफ़िलों में
देखती फ़िल्में -
हर पल बिताए
सभी दिनों की
हसीन थे जो सारे,
उन्हीं दिनों को
तह पे तह लगा
बंद पेटी में
बुरी नज़र वाले
हर साथी से 
छिपा  कर रखूँगी
सूने में ही खोलूँगी ।

-0-

Monday, December 4, 2017

784

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मन-मीत चले आओ
दो पल बाकी हैं
सीने से लग जाओ।
2
तन से तुम दूर रहे
पर सूने मन में
तुम ही भरपूर रहे ।
3
बस इतना जाने हैं-
इस जग में तुमको
हम अपना माने हैं।
4
जाने कब आओगे !
बाहों में खुशबू
बनकर खो जाओगे।
5
कुछ समझा नहीं आता
कितने जन्मों का 
मेरा तुमसे नाता ।
6
जब अन्त इशारा हो
होंठों पर मेरे
बस नाम तुम्हारा हो।
7
जिस लोक चला जाऊँ
चाहती इतनी-सी-
तुमको ही मैं पाऊँ।
8
तुमको जब पाऊँगा-
पूजा क्या करना
मंदिर क्यों जाऊँगा।
9
चन्दा तुम खिल जाना
सूनी रातें हैं
धरती से मिल जाना।
10
अम्बर भी अकेला है
प्यासी धरती से
मिलने की बेला है।
11
जीवन में प्यास रही-
जो दिल में रहते
मिलने की आस रही।
12
चित्र; कमला निखुर्पा 
बादल तुम ललचाते
आकर पास कभी
क्यों दूर चले जाते ।
13
धरती ये प्यास-भरी
बादल रूठ गए
मन की हर आस मरी।
14
तुमको पा जाऊँगी
कब तक रूठोगे
हर बार मनाऊँगी।
16
इस आँगन बरसोगे
प्यासा छोड़ मुझे

तुम भी तो तरसोगे।
-0-

Friday, December 1, 2017

783

मंजूषा मन
तुम मन को भाते हो
मन में बसकर तुम,
कितना इठलाते हो?
पहले ना खबर हुई
मन में आप बसे,
तब मुश्किल जबर हुई।
सन्नाटा गहरा था
तेरे आने से
टूटा हर पहरा था।
जन्मों तक तुम मिलना
मेरे मन बस कर,
तुम फूलों से खिलना।
होता जो अच्छा है
तुम विश्वास करो
ये रिश्ता सच्चा है।

-0-

Friday, November 24, 2017

782

माहिया :
नोक-झोंक माहिया का विशिष्ट गुण हुआ करता था , जो जीवन की आपाधापी में गुम होता गया। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा जी ने अपने माहिया में इसे जीवन्त कर दिया है। -सम्पादक
 डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
ये तय इस बार किया 
मैं जाती मैके
घेरो घर-बार पिया।
2
भर चटनी की बरनी 
सखियों संग मुझे 
थोड़ी मस्ती करनी।
3
सब ढंग निराले हैं 
अफसर तुम सजना
छुट्टी के लाले हैं ।
4
तू है मन की भोरी 
खूब थका लेंगी 
चंचल सखियाँ तोरी ।
5
दिल को दिल भाएँगे 
दिन दो-चार रुको 
दोनों मिल आएँगे ।
6
ग़म से पहचान नहीं 
तुम बिन अब सजनी 
जीना आसान नहीं ।
7
मत बात करो खोटी
तुम घूमो जग में 
मैं घर सेकूँ रोटी ।
8
सीधा- सा काम करो 
टिकट अभी मेरा 
बनवा आराम करो ।
9
ये राग पुराने हैं 
बाँध मुझे रखना 
सब खूब बहाने हैं ।
10
क्या बात करो गोरी ?
कटतीं ना सच में 
तुम बिन रतियाँ मोरी ।
11
देखो मनुहार करूँ
तुम बिन चैन नहीं 
बस तुमसे प्यार करूँ ।
12
दुखतीं अँखियाँ मेरी 
फोन मुआ तेरा 
कितनी सखियाँ तेरी ।
13
कितना बतियाते हो 
क्या जानूँ कित से 
दाना चुग आते हो ।
14
मैं तो अब जाऊँगी 
कुछ दिन जी भरकर 
मिल, वापस आऊँगी ।
15
जपना मीरा, राधा 
हो आजाद पिया 
सब दूर हुई बाधा ।
16
छोड़ो भी ये ताना 
ओ सजनी प्यारी  
जल्दी घर आ जाना ।
17
हूँ चाँद, चकोरी ने 
फोन किया देखो 
मैके से गोरी ने ।
18
कैसे हैं हाल पिया 
महँगी है रोटी 
गलती क्या दाल पिया ।
19
मत फिकर करो मेरी 
दे जाती थाली 
दिलदार सखी तेरी ।
20
है बात न जल्दी की 
मुझको क्या चिंता 
आटे या हल्दी की ।
21
कैसे नादान पिया 
फैटी फ़ूड तुम्हें 
देता नुकसान पिया।
22
मैं टिकट कटाती हूँ 
साँझ ढले सजना 
वापस घर आती हूँ ।

-0-

Tuesday, November 21, 2017

781

मन का साथी 
डॉ.पूर्णिमा राय

समेट लिया
सूनापन भीतर
विस्तृत मन
नीलांबर को घेरे
उड़ते पाखी
हो गए हैं विलीन
मनु आहत
कैसी दिखती सृष्टि 
प्रेम- विहीन
श्रद्धा एवं इड़ा भी
व्याकुल बड़ी
ढूँढने है निकली
मन का साथी
दूर करे खालीपन
तृप्त हो रूह
चलके भक्ति- मार्ग
निस्वार्थ सेवा
कर्मरत मनुज
बाँटे खुशियाँ 
खोज लेता आशाएँ
अन्धकूप में 
बटोही की पुकार
 बंजर भूमि
बुनियाद से हिली
धँसती जाती
अपनों से आहत
है सदा सीता मैया!!
-0-
 डॉ.पूर्णिमा राय,शिक्षिका
अमृतसर (पंजाब)
ईमेल-drpurima01.dpr@gmail.com