Thursday, July 27, 2017

772

चोका
-डॉ सुधा गुप्ता
 सावन आये
बहना को भेंटने
बादल-साड़ी
बुँदियों का शृंगार
तीज-त्योहार
बहनें करती हैं
भरे मन से
सिंधारा-इंतज़ार
शाखों के झूले
चिड़ियाँ गातीं गीत-
'पिया-रंगीले'
बहना ने भेजा है
मैके सन्देश-
भइया, ज़रूर आना
राखी बँधाना
बनाऊँ पकवान
रोली-अक्षत
आरती का सामान
करूँ तैयार
आस-भरे नयनों
देखा करूँ दुआर!!
-0-
सेदोका
1-डॉ सुधा गुप्ता
1
यत्न से रखीं
तहाकर जो यादें
अतीत के सन्दूक
खोल बैठी जो,
देखा वक़्त-सितम,
सब चकनाचूर!
2.
पावस-साँझ-
उफनती नदिया
गहराता अँधेरा
जाना है पार
नौका कोई घाट
अछोर फैला पाट
3.
जिस आँख में
समाती नहीं बूँद
ढुलकती बाहर
अचरज है
कैसे तो समा गया
तेरा रूप-सागर
4
बरखा रानी
पूरी ठसक साथ
सजी शाही पोशाक
रथ सवार
खस-भीगी पंखी है
हाथ, शोभा अपार
5.
कल  शृंगार
बने गले का हार
भक्त जन निसार
आज निर्माल्य:
उतार फेंके गए
कचरा पड़ा द्वार!
6.
पड़ी बधाई
बंद मुट्ठी थे
जाने क्या-क्या ले
जाने की बेला:
सब कुछ बाँट के
पड़े हाथ पसारे  
-0-
-सुधा गुप्ता
120 बी /2, साकेत, मेरठ.
शिवरात्रि, 21. 07. 17.
-0-
2- 
शशि पाधा
  1
हिरना मन
वन -वन भटका
नित ढूँढे, न पाए  
कस्तूरी -गंध
मन में ही बसती
 फिर क्यों भरमाए
    2
 तारों की टोली
 चली अम्बर -गली
 करती खिलवाड़
आकाश गंगा
मुसकाए-निहारे
बाँटे खीर कटोरे
-0-


Saturday, July 22, 2017

771

कृष्णा वर्मा

शब्द कमाल
हिलें ना डुलें पर
चलते ऐसी चाल
बे हथियार
सहज कर देते
जुदा रिश्तों से प्यार।

मरी है शर्म
कैसे करें बयान
सूखा आँख का पानी
ढोएं माँ-बाप
ज़िम्मेदारियों का बोझ
च्चों  की मनमानी।

कैसा ज़माना
बदले हैं अपने
मरे हैं अहसास
पीड़ा ना दर्द
रिश्तों की टूटन क्यों
चुभती नहीं आज।

होंठों पे ताला
घुटा-घुटा जीवन
जीता आज ज़माना
पहचाना भी
लगे अब अंजाना
मन हुआ सयाना।

खोया है कहाँ
ढूँढें दिशा-देश में
अपना बचपन
जिस गली में
फुर्स जैसे  ऊँचे
थे अपने मकान।

-0-

Sunday, July 2, 2017

770

     पुष्पा मेहरा 
          
     स्याह रात है
    जाग आया है चाँद
    आज ईद का,
    मात्र चाँद ही नहीं
    संदेशा है ये
    प्रेम-भाईचारे का ,
    रोशनी मात्र !
    प्रात और रात का
    हरती तम
    पर कटार
    ज्ञान की सदा ही
    काटे जड़त्व,     
    यह मन हमारा
    है तानाशाह
    सुनता और करता
    सदा मन की ,
         भेद नीति अपना
    गाड़े स्तम्भ
    अपनी नीतियों के
    चले कुचालें
    जाल धर्मान्धता का
    बिछा कर ये 
    छलता जनता को
    प्रेम-दिखावा 
    पानी में परछाईं
    बना छलता
    गले लगाने बढ़ो
    तो फिसलता         
    पर अबकी चाँद
    अंधकार में
    उजाला साथ लाया 
    देगा खुशियाँ
    तोड़ देगा दीवार
    नफरत की
    मिलेंगे गले सब
    तोड़-खंजर,
    चाँद -सा होगा मन
    हर पल रोशन        

          -0-       

Friday, June 16, 2017

769

सेदोका
1-भावना सक्सैना
1
बदला नहीं
वो जमाने के संग
हर रंग बेरंग,
कहता रहा
जो भी हो दस्तूर
मिलना है रूर।
2
सुधि- निर्झर
बहता कल -कल
सहलाता है मन,
वेदना- सिक्त
दुष्कर से क्षणों में
बनता आलंबन।
3
यादों के मोती
भरे दिल के सीप
कितने ही सालों से,
यादें सरल
निष्कपट, दूर है
जग की चालों से।
4
जीवन -संध्या
विश्लेषण के पल
अनुभव के बोरे,
विचारमग्न,
दूर चले कितने
रहे फिर भी कोरे।
5
जीवन -माला
गुज़रते वर्ष हैं
मनके सुनहरे,
मन के धागे
नित रहें  बाँधते
नूतन संगी मेरे।
-0-
ताँका
सुनीता काम्बोज
1

पगला मन
आशाओं का खिलौना
खेलता रहा
भ्रम के ही तूफान
नित झेलता रहा ।
2
कानन घना
तम और सन्नाटा
पसरा रहा
जीवन में सभी तो
बिन बोले ही कहा
3
पूर्ण आशाएँ
तृप्त हर सपना
तृष्णा संन्यासी
माया रही अछूती
फिर क्यों ये उदासी ?
4.
अबूझ लगी
पहेली जीवन की
करूँ प्रयास
सुलझेगी ज़रूर
मन  में बची आस
5
रूप है रोया
मार कर दहाड़
किस्मत हँसी
होठों पर मुस्कान
सिर्फ़ समय जीता ।
6
ज्ञान की बूँद
ह्रदय में बहती
है मिथ्या भ्रम
अभिमान जगाए
खुद के गुण गाए।
7
चिता जलती
यादों की फिर आज
कपट का कफ़न
धू -धू -धूकर जला
प्रपंच छोड़ चला।

-०-