Saturday, March 25, 2017

756

1-जी जाएगी गौरैया -भावना सक्सैना
बहता जाए
जीवन का झरना
संग हवा के
महकता यादों से
देख गौरैया
जी उठता मन में
कच्चा आँगन
फुदकती फिरती
नन्ही गौरैया
बीनकर तिनके
नीड़ सजाती।
नाजुक थी फाहे -सी
कलरव से
गूँजे घर आँगन
सुख के क्षण
दिनभर पलते
चीं- चीं सुनती
सपने थी बुनती
बीते बरस
अब यादें पलती।
रही घूमती
भर चोंच तिनके
मिला न ठौर
कंक्रीट के जंगल
ऊँची दीवारें
बन्द हैं खिड़कियाँ
खोया आश्रय
रहेगी कहाँ अब?
प्यारी गौरैया
आओ मिलके सब
पोस लें इसे
कुछ वृक्ष रोप दें
द्वार पे रखें
अंजुरी भर पानी
नित दाना दें
जी जाएगी बरसों
प्यारी नन्ही गौरैया ।
-0-
जुगल बन्दी : माहिया
ज्योत्स्ना प्रदीप
1
हर पल हैं उजियाले
यादों के जुगनूं
हमनें दिल में पाले ।
0
ये सपन सलोना है
जगमग सा अब तो
दिल का हर कोना  है।
2
जीवन उजियारा है
पास वही अपनें
हमको जो प्यारा  है।
0
मन ये मजबूर हुआ
मन को जो प्यारा
बस  वो ही दूर हुआ।
3
जीवन अब भार नहीं
मन में संशय की
कोई दीवार नहीं ।
0
चुप सी हैं दीवारें
फीके रंग पड़े
सीली ईंटें ,गारे ।
4
ये दरद सरीखा है।
चुप -चुप सा मन में
ना बोला ,चीखा है।
0
गम    बात नहीं  करते
दिल की चोटों को
बस आँसू से तरते ।
5
इतना अहसान करो
हर अपनें  ग़म को
बस मेरे नाम करो।
0
हर सुख तुझ पर वारे
मेरी आँखें में
तेरे दुख के धारे ।
6
तुम बिन दिन थे रीते
तुमको भान नहीं
हम कैसे थे जीते।
0
अब याद नहीं आता
कब बिछुरे थे हम
कई जन्मों का नाता।


-0-

Wednesday, March 15, 2017

755



डॉ सरस्वती माथुर 
1
तेरे बिन जीना है
फागुन में सजना
यादों को पीना है।
2
वो बात नहीं करते 
फिर भी देखो तो
हम उन पर ही मरते। 
3
पल -पल मन जलता है
नैनों में सपना
तेरा ही पलता है।
-0-

Wednesday, March 1, 2017

754



डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
वो राग बजाना है
सूखे अधरों पर
अब गीत सजाना है।
2
मौसम अरमानों का
होंठों को देगा
गहना मुस्कानों का !
3
क्या खूब इरादा था
याद करो , जल्दी
मिलने का वादा था !
4
जाने क्या बोल गईं
कंगन ,पैंजनियाँ
बातें सब खोल गईं !
5
इन काली रातों में
खूब उजाले हैं
प्रियतम की बातों में !
6
दुख तो कम करती हैं
नयनों से बादल से
बूँदें जब झरती हैं !
7
रीती क्यों गागर है
सूखी है नदिया
तृष्णा का सागर है !
8
माँझी से प्यार नहीं
हरि-सुमिरन की भी
थामी पतवार नहीं !
-0-

Wednesday, February 15, 2017

753



मौसम
1-शशि पाधा
1
कैसा घोटाला है
किरणें बेरंगी
नभ काला काला है ।
2
बादल के दोने में
दुबका बैठा है
सूरज उस कोने में ।
3
दिन रीते- रीते हैं
पीली धूप बिना
दिन फीके-फीके हैं ।
4
ये धरती पगलाई
घर घर ढूँढ रही
पहली -सी तरुणाई।
5
कैसा अंधेरा है
अम्बर गलियों में
किस ग्रह का डेरा है ।
7
पछुआ जब झूल गई
घर के रस्ते को
पुरवाई भूल गई ।
8
कैसा कुहराम मचा
धूप सहेली बिन
सर्दी का ब्याह रचा ।
9
गहरी धुँधलाहट में
पंछी काँप रहे
कितनी झुँझलाहट में ।
10
कुछ कम तैयारी थी
मौसम की बाजी
सूरज ने हारी थी ।
-0-
2-डॉ. सरस्वती माथुर
1
बासंती मन बूटे
 लागे ना है मन
 दर्द बँधें जो खूँटे ।
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