Thursday, January 3, 2019

850- पुल




डॉ .कविता भट्ट
1
पास में खड़ा
मोटर पुल नया,   
पैदल पुल-
अब चुप-उदास 
था लाया हमें पास

2
बचपन था-
जहाँ झूलता मेरा,
टँगा है मन
ननिहाल के उसी
आम के पेड़ पर
3
जब से बना 
पुल मोटर वाला,
बह रही है
अलकनंदा नदी
अब रुकी-की -सी 
4
वाहन तुम
पुल पर दौड़ते
नदी-सी हूँ मैं
शान्ति से बहती
सब कुछ सहती  
5
मानव नंगा
कैसे पाप धोएगी
काँवर गंगा !
उदारमना शिव
भावे आत्माभिषेक
-0-

Tuesday, December 25, 2018

849



1-कृष्णा वर्मा
1
थोड़ी रंगीन
है थोड़ी- सी रुमानी
ज़िंदगी क्या है
अनूठा सा गणित
है प्यार की कहानी।
2
ऊँची-नीची -सी
हैं पथरीली राहें
कैसे बताएँ
बहते दरिया की
है ये कोई रवानी।
3
कर्मों से बँधी
मूल्यों में ढली हुई
वंश- निशानी
भोली कुछ नादाँ-सी
है थोड़ी -सी सयानी।
4
बड़ी कठिन
ज़िंदगी की किताब
पढ़ें तो कैसे
पल-पल बदलती
ये अपने मिज़ाज।
5
बची न वफ़ा
रिश्तों की बेदर्दी से
रोई ज़िंदगी
बाकी अब जीने का
दस्तूर है निभाना।
-0-
2-ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
बचपन के 
शहतूत से दिन
चूसे वक़्त ने,
मिठास बाकी है
कहीं न कहीं अभी
2
रात्रि के केश
बूँदों से हुए गीले
नींद से जागे
सागर, नदी ,ताल
बूँदें करें बवाल !
3
तेरी रागिनी
सुनी थी रात भर
हरेक स्वर
भर गया मिठास 
जैसे झोंके बतास!
4
तुम्हारे बोल
किसी कवि के छन्द
घन -आनन्द
मन भीतर भरा
सुख का सोना खरा !
5
राग विहाग 
बैठी थी जब गाने
मधु -माधव 
लाया बसंत राग
हथेली उगा  फाग।
6
सूनी थीं आँखें 
गीली सपन -पाँखें 
तुम जो आ
नेह है आसमान 
इक नई  उड़ान।
7
पुष्प -पलाश
तन- मन ले आग
मनाता  होली
अनोखा तेरा भाग
अनवरत फाग !
8
तुम्हें चाहा था
बहुत सराहा था
एक बार ही
दर्द  सहला देते
मन बहला देते !
9
क़्त बदला
तुम नहीं बदले
आज भी लगे 
सरल भले -भले
चन्द्रमा  से उजले !
-0-

Monday, December 24, 2018

848-प्रीत की रीत

डॉ.पूर्वा शर्मा


चित्र गूगल से  साभार
प्रीत की रीत
सदा यही कहती-
मिलन नहीं,
विरह ही जीवन,
अगाध प्रेम
लेकिन हो न सके
श्याम राधा के,
सीता से दूर हुए
पुरुषोत्तम,
मीरा भी पा न सकी
गिरधर को,
मैं पाने चली तुम्हें
भूल ही गई
जग की रीत यही
प्रेमी परिंदे
तपते ही रहे सदा
विरहाग्नि में,
गुरना ही पड़ा   
ईश्वर को भी
इस शूल- पथ से
बिछौड़ा भोगा,
तपकर निखरे
मिसाल बने,
कैसे बचते फिर
हम दोनों भी
इसके चंगुल से,
हम ठहरे
तुच्छ प्रेमी परिंदे,
पार करेंगे
हर कठिनाई को
आसानी से यूँ
मुस्कुराते औ’ गाते,
प्राप्त करेंगे
इस प्रेम पथ पे
इक दूजे का साथ

Saturday, December 22, 2018

847


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
रिश्ते हैं सर्द
आँच बनाए रखो
जीवन बचे
गूगल से साभार 
मेहँदी रचे हाथ
नित नया ही रचें ।
2
तन -कस्तूरी
मन- मृग आकुल
हाँफता रहा
अगर तू न मिला
कुछ नहीं हासिल।
3
जुड़े हैं प्राण
सूत्र प्यार तुम्हारा
कच्ची है डोर
हाथ में तुम्हारे हैं
इसके दोनों छोर।
4
काल से परे
होते सब सम्बन्ध
टूटते नहीं
तोड़े कोई जितना
उतने और जुड़ें।
5
तेरी छुअन
भूल न सका तन
रोम-रोम में
घुली तेरी खुशबू
बन गई चन्दन।
6
एकान्त टूटा
मंदिर की सीढ़ियाँ
हुई मुखर,
तेरे चरण चूमें
आनन्द-पगी झूमें।
7
मन-पाटल
झरी हर पाँखुरी
शूल ही बचे।
धूल भरी साँझ है
अब कोई क्या रचे!
-0-

Monday, December 17, 2018

846-चुप ही है लड़की


चुप ही है लड़की
डॉoकविता भट्ट

स्वयंप्रभा थी
चित्र - गूगल से साभार
सुरम्या थी ,जो कभी
दीपशिखा-सी
मौन है ओढ़े हुए
बुझी रात्रि के
यों शीत तिमिर से
कुछ नमी है
मन के भीतर ही
आँखों की छत
अब भी न टपकी
चुप ही है लड़की...

Tuesday, December 4, 2018

845-रूपसी बनजारिन


उड़ान
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
साँझ हो गई
बन -बन भटकी
भूखी व प्यासी
रूपसी बंजारिन
पिया ! कद्र न जानी।
2
दीप जलाए
अँधियारे पथ में
दिए उजाले,
सदा हाथ जलाए
पाए दिल पे छाले।
3
आँख  लगी थी
सुनी हूक प्रिया की
सपना टूटा,
निंदिया ऐसी उड़ी
उम्र भर न आई।
4
आहत मन
अगरू गन्ध रोई
मन्त्र  सुबके
उदासी -भरा पर्व
अश्रु का आचमन।
5
प्राण खपाए
बरसों  व्रत -पूजा
करके थके
आरती की  थाली थी
लात मार पटकी।
6
प्राणों में जो था
उसे पा नहीं  सके
द्वार गैर के
कभी जा नहीं सके,
प्रारब्ध में यही लिखा।
7
छलक उठे
रूप -रस -कलश
नदी -सी बही
सींचे निर्मलमना 
अभिशप्त  ही रही।
8
शिथिल तन
रुदन- भरा कंठ
हिचकी उठी
बीनती बरौनियाँ
उम्र खेत से सिला*
9
आठों ही याम
कलह -रतजगा
असुर -पाठ
जीवन, मृत्यु-द्वार
भीख माँगते थका।
10
युगों से जगी
थकान- डूबी प्रिया
अंक में सोई
शिशु-सा भोलापन
अलकों  में बिखरा।
11
जीवन मिला
साँसों का सौरभ भी
तन में घुला
अधरों से जो पिए
नयनों के चषक।
12
तेरी सिसकी
सन्नाटे को चीरती
बर्छी -सी चुभी
कुछ तो ऐसा करूँ
तेरे दुःख मैं वरूँ
(20-11-2018)
-0-
*सिला*
फसल कटने के बाद कुछ अन्न बिखर जाता है। उसे सिला कहते हैं। ज़रूरतमंद खेतों में आकर उसे एकत्र कर लेते हैं।

Sunday, November 25, 2018

844


पाया बहुत

डॉ सुरंगमा यादव

पाया बहुत
है जग से हमने
धरा का प्यार
गगन का विस्तार
उज्ज्वल हास
रिश्ते बहु प्रकार
पर है रीता
मन का मृदु कोना
वो मन भाया
रहा सदा पराया
उम्र की नौका
लगने लगी पार
जाना ही होगा
एक दिन हमको
आगे या पीछे
जग से आँखें मींचे
तब संभव,
बदले मन भाव
पर क्या लाभ!
पछतावा ही शेष
व़क्त की रेत
हाथों से है फिसली,
तब पिघली
निष्ठुरता मन की
जिसको लिये
जीवन भर जिये
द्रवित हुए
जो मेघ समय पे
वही सार्थक
समय ग पर
जो बरसे वे व्यर्थ !
-0-